गुरप्रीत कालरा
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
व्योमेंद्र कुमार सिंह
लोकल न्यूज ऑफ इंडिया
औरैया: “जब जमीन की राजनीति से ज्यादा गलियारों की सरगोशियां सुनाई देने लगें, तो समझिए सियासी समीकरण करवट ले रहे हैं…”
2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ औरैया जिले की राजनीति में हलचल बढ़ने लगी है। भाजपा संगठन से जुड़े पदाधिकारियों से लेकर प्रदेश स्तर पर प्रभाव रखने वाले नेताओं की सक्रियता के बीच टिकट और संगठनात्मक समीकरणों को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
भाजपा की जिला कार्यकारिणी में जिलाध्यक्ष सर्वेश कठेरिया के नेतृत्व में जिला महामंत्री और जिला मंत्रियों को जिम्मेदारियां दी गई हैं। वहीं राज्यसभा सांसद गीता शाक्य को प्रदेश महामंत्री बनाए जाने और बाद में ब्रज क्षेत्र का प्रभारी बनाए जाने के बाद संगठनात्मक राजनीति में उनकी भूमिका भी चर्चा में है।
इसी बीच राजनीतिक चर्चाओं में एक और शब्द सुनाई देने लगा है—“कथित बड़े मंत्री”। हालांकि किसी विशिष्ट व्यक्ति का नाम सामने नहीं आया है और इस तरह की चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हुई है। फिर भी सियासी गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि आने वाले चुनाव में टिकट और संगठन से जुड़े फैसलों पर किस स्तर के नेताओं का प्रभाव रह सकता है।
दूसरी ओर जिले की अलग-अलग विधानसभा सीटों में स्थानीय नेताओं के बीच राजनीतिक प्रभाव और संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिशें भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। चुनाव नजदीक आने के साथ संभावित दावेदारों की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है और इसी के साथ मुलाकातों तथा राजनीतिक गतिविधियों का सिलसिला भी तेज होता दिखाई दे रहा है।
यहीं से एक अहम सवाल उभरता है—जमीन पर सक्रिय कार्यकर्ता और संगठन के भीतर बनने वाले समीकरणों के बीच संतुलन कैसे बनेगा?
भाजपा नेतृत्व लगातार कार्यकर्ताओं को संगठन की रीढ़ बताता रहा है। ऐसे में यदि कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बनती है कि संगठन में मेहनत के साथ-साथ पहुंच और प्रभाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, तो यह पार्टी के स्थानीय ढांचे के लिए चर्चा का विषय बन सकता है। हालांकि, ऐसे दावों या धारणाओं की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग मामलों में होना बाकी है।
फिलहाल औरैया की राजनीति में जिलाध्यक्ष की संगठनात्मक भूमिका, जिला महामंत्री और मंत्रियों की सक्रियता, प्रदेश स्तर के नेताओं का प्रभाव और पर्दे के पीछे बताए जा रहे विभिन्न राजनीतिक समीकरणों पर निगाहें टिकी हैं।
2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उससे पहले संगठनात्मक गतिविधियां और संभावित दावेदारों की सक्रियता आने वाले राजनीतिक माहौल की दिशा जरूर तय कर सकती है।
आखिर फैसलों में जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होगी और संगठन के भीतर बनने वाले समीकरण किस दिशा में जाएंगे? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में धीरे-धीरे सामने आ सकते हैं।
लेखक चुनावी प्रबंधन संस्था इलेक्टलाइन में राजनीतिक विश्लेषक और लोकल न्यूज ऑफ इंडिया में ब्यूरो हेड हैं।