बिहार की राजनीति में कभी एक कहावत चलती थी—दिल्ली में सरकार चाहे जिसकी हो, पटना की राजनीति का असली केंद्र नीतीश कुमार ही हैं। लगभग दो दशकों तक उन्होंने खुद को उस नेता के रूप में स्थापित किया जिसने गठबंधनों को बनाया भी और गिराया भी। लेकिन राजनीति में समय का चक्र बहुत तेज घूमता है। आज वही नीतीश कुमार राज्यसभा की राह पर खड़े दिखाई दे रहे हैं और बिहार की सियासत में यह सवाल तेज हो गया है—क्या यह उनकी सक्रिय राजनीति का अंत है या एक सोची-समझी रणनीति का परिणाम?
नीतीश कुमार की पूरी राजनीति संतुलन की राजनीति रही। कभी वे भारतीय जनता पार्टी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी बने, तो कभी उसी भाजपा के सबसे बड़े आलोचक के रूप में सामने आए। 2013 में उन्होंने भाजपा से दूरी बनाई और खुद को धर्मनिरपेक्ष राजनीति का नया चेहरा बताने की कोशिश की। फिर 2017 में वे वापस उसी भाजपा के साथ सत्ता में आ गए। 2022 में उन्होंने एक बार फिर पाला बदला और विपक्षी खेमे के साथ खड़े हो गए।
यह लगातार बदलती राजनीतिक दिशा ही उनकी ताकत भी बनी और कमजोरी भी। क्योंकि हर बार गठबंधन बदलने के साथ उनके भरोसे पर सवाल उठते गए। खासकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह—के साथ उनके रिश्ते समय के साथ और जटिल होते गए। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लंबे समय से रही कि भाजपा नेतृत्व बार-बार के इस राजनीतिक उतार-चढ़ाव को भूलने वाला नहीं है।
आज जब नीतीश कुमार राज्यसभा की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं, तो कई विश्लेषक इसे सिर्फ पद परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि अगर नीतीश सक्रिय राज्य राजनीति से दूर होते हैं तो सबसे बड़ा झटका उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) को लगेगा। जदयू की पूरी राजनीति एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पार्टी के भीतर ऐसा कोई दूसरा चेहरा नहीं उभरा जो राज्य स्तर पर वही राजनीतिक पकड़ बना सके।
यही वजह है कि बिहार की राजनीति में एक नई चर्चा जोर पकड़ रही है—क्या यह वही क्षण है जब भाजपा बिहार में अपने दम पर पूरी ताकत से उतरना चाहती है? पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने राज्य के कई इलाकों में अपना संगठन मजबूत किया है। बूथ स्तर तक फैलते संगठन और नए सामाजिक समीकरणों ने पार्टी को पहले से कहीं अधिक मजबूत बना दिया है। ऐसे में भाजपा के लिए जदयू पर निर्भर रहना अब जरूरी नहीं रह गया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का एक वर्ग मानता है कि यही वह बिंदु है जहाँ नीतीश कुमार की राजनीति कमजोर पड़ सकती है। अगर वे राज्य की सक्रिय सत्ता राजनीति से बाहर जाते हैं, तो जदयू के भीतर कई गुट उभर सकते हैं। कुछ नेता भाजपा के करीब जा सकते हैं, कुछ अपनी अलग राह तलाश सकते हैं। ऐसी स्थिति में पार्टी का संगठन धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। पिछले एक दशक में भाजपा ने कई राज्यों में पहले गठबंधन किया, फिर धीरे-धीरे अपने संगठन को इतना मजबूत कर लिया कि सहयोगी दल हाशिये पर चले गए। महाराष्ट्र, कर्नाटक और पूर्वोत्तर के कई उदाहरणों को इसी संदर्भ में देखा जाता है। बिहार में भी वही राजनीतिक प्रयोग होने की चर्चा तेज है।
लेकिन राजनीति में अंतिम फैसला कभी इतना सरल नहीं होता। बिहार की सामाजिक संरचना जटिल है। यहाँ जातीय समीकरणों का असर गहरा है और क्षेत्रीय दलों की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण है। इसलिए यह भी संभव है कि नीतीश कुमार किसी नए राजनीतिक समीकरण के साथ फिर वापसी कर लें। भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ नेताओं को समय से पहले खत्म मान लिया गया और वे फिर से सत्ता के केंद्र में लौट आए।
फिर भी इतना तय है कि बिहार की राजनीति अब उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ सत्ता का संतुलन तेजी से बदल रहा है। जिस नेता ने कभी दिल्ली और पटना के बीच की राजनीतिक दूरी को अपने हिसाब से तय किया, वही आज नए समीकरणों के बीच घिरा हुआ दिखाई देता है।
सवाल केवल इतना नहीं है कि नीतीश कुमार राज्यसभा जाएंगे या नहीं। असली सवाल यह है कि अगर ऐसा होता है, तो क्या जदयू वही पार्टी रह पाएगी जिसने दो दशकों तक बिहार की राजनीति की दिशा तय की? या फिर यह वही क्षण है जब बिहार की राजनीति एक नया अध्याय लिखने जा रही है—एक ऐसा अध्याय जहाँ पुराने समीकरण टूटेंगे और नई सत्ता की धुरी बनेगी।
और इसी कारण आज बिहार के राजनीतिक गलियारों में एक तीखा सवाल गूंज रहा है—क्या वाकई वह समय आ गया है जब लोग कहने लगें: तो निपट गए नीतीश!