लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में करीब 22 साल बाद बड़ा न्यायिक घटनाक्रम सामने आया है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी को बड़ा झटका देते हुए निचली अदालत के बरी करने के फैसले को निरस्त कर दिया है। साथ ही कोर्ट ने उन्हें तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद वर्मा की खंडपीठ ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद यह फैसला सुनाया। मामले की जांच कर रही सीबीआई ने अदालत में करीब 11 हजार पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की थी, जिसके आधार पर अमित जोगी पर आरोप तय किए गए थे।
फैसले के बाद अमित जोगी ने इसे अपने साथ “गंभीर अन्याय” बताया और कहा कि वे न्याय के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख करेंगे।
गौरतलब है कि यह मामला 4 जून 2003 का है, जब नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता और कोषाध्यक्ष रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने उस समय पूरे राज्य में सनसनी फैला दी थी।
इस मामले में वर्ष 2007 में रायपुर की विशेष अदालत ने 28 आरोपितों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जबकि अमित जोगी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। बाद में जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने इस फैसले के खिलाफ अपील की, जिसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय से होते हुए उच्च न्यायालय पहुंचा।
मामले में कुल 31 आरोपित बनाए गए थे, जिनमें से दो सरकारी गवाह बन गए थे। शेष आरोपितों को दोषी ठहराया गया था।