लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
ऋचा बर्नवाल
यूरोप में जारी भीषण हीटवेव के दौरान कई देशों, खासकर ब्रिटेन में सड़कें नरम पड़ने और क्षतिग्रस्त होने की घटनाएं सामने आई हैं। इससे लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि जब भारत में गर्मियों के दौरान तापमान अक्सर 45°C या उससे अधिक पहुंच जाता है, तब यहां सड़कें सामान्य रूप से कैसे टिक जाती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इसका कारण निर्माण की गुणवत्ता नहीं, बल्कि स्थानीय जलवायु के अनुरूप अपनाई गई इंजीनियरिंग है। यूरोप की सड़कें कड़ाके की ठंड और बर्फबारी को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। वहां अपेक्षाकृत नरम बिटुमेन और अधिक लचीले डामर मिश्रण का उपयोग किया जाता है ताकि सर्दियों में सड़कें फटें नहीं। लेकिन यही सामग्री असामान्य गर्मी में नरम पड़ जाती है और भारी वाहनों के दबाव से सड़कें क्षतिग्रस्त होने लगती हैं।
वहीं भारत में सड़क निर्माण के दौरान गर्म जलवायु को प्राथमिकता दी जाती है। यहां VG-30 और VG-40 जैसे कठोर बिटुमेन तथा बड़े एग्रीगेट्स वाले मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है, जो ऊंचे तापमान में भी मजबूती बनाए रखते हैं। इसलिए भारतीय सड़कें भीषण गर्मी और भारी यातायात का बेहतर सामना कर पाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह अंतर सड़क निर्माण की गुणवत्ता नहीं, बल्कि अलग-अलग मौसम के अनुसार अपनाई गई तकनीक का परिणाम है।