लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
ऋचा बर्नवाल
पुणे: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। 03 जुलाई 1908 को महान स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को ब्रिटिश सरकार ने राजद्रोह (Sedition) के आरोप में गिरफ्तार किया था। उन पर अपने समाचार पत्र 'केसरी' में प्रकाशित लेखों के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ लोगों को भड़काने का आरोप लगाया गया था।
बाल गंगाधर तिलक उस दौर में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। उनका प्रसिद्ध नारा "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा" देशभर में आजादी की अलख जगाने का प्रतीक बन गया था। उनके लेख और भाषण युवाओं और आम जनता में राष्ट्रीय चेतना का संचार कर रहे थे, जिससे ब्रिटिश सरकार चिंतित थी।
गिरफ्तारी के बाद उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। इसके बाद उन्हें तत्कालीन बर्मा (अब म्यांमार) के मांडले जेल भेज दिया गया। जेल में रहते हुए भी तिलक ने अपना लेखन जारी रखा और अपनी प्रसिद्ध कृति 'गीता रहस्य' की रचना की, जिसे भारतीय दर्शन और कर्मयोग पर महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी ने पूरे देश में विरोध प्रदर्शन और जनआंदोलनों को नई दिशा दी। इस घटना ने स्वतंत्रता आंदोलन को और अधिक मजबूत बनाया तथा भारतीयों में ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष की भावना को तेज किया।
आज भी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को भारतीय राष्ट्रवाद के अग्रदूतों में गिना जाता है। शिक्षा, पत्रकारिता, सामाजिक जागरण और राजनीतिक नेतृत्व के क्षेत्र में उनका योगदान भारतीय इतिहास में अमिट है। उनकी गिरफ्तारी का यह दिन स्वतंत्रता संग्राम के एक निर्णायक अध्याय के रूप में याद किया जाता है।