लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
‘इतिहास’ स्वभाव से निष्पक्ष और निर्मम होता है, जबकि ‘श्रद्धा’ असंभव में भी विश्वास की शक्ति देती है। भारतीय परंपरा में यह दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। श्रद्धा का आधार इतिहास से प्राप्त तथ्यों पर टिका होता है, जिसे संस्कृति और लोकमान्यता विस्तार देती है।
भारतीय चिंतन में राम, कृष्ण और शिव को त्रिदेव के रूप में देखा गया है। डॉ. राममनोहर लोहिया ने इन्हें ‘पूर्णता के तीन महान स्वप्न’ कहा—राम मर्यादित व्यक्तित्व के प्रतीक हैं, कृष्ण उन्मुक्तता के और शिव असीमितता के। तीनों ही अपने-अपने रूप में पूर्ण हैं।
वैदिक परंपरा के अनुसार, वैवस्वत मनु से लेकर इक्ष्वाकु वंश तक भारतीय राजसत्ता का विकास हुआ। इसी वंश में कई पीढ़ियों बाद भगवान श्रीराम का जन्म हुआ, जिन्हें महर्षि वाल्मीकि ने ‘आदर्श मनुष्य’ के रूप में चित्रित किया। बाद में गोस्वामी तुलसीदास ने उन्हें ईश्वर स्वरूप में प्रतिष्ठित किया।
रामकथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति और राज्य व्यवस्था का दर्पण भी है। ‘रामराज्य’ की अवधारणा न्याय, समानता और समृद्धि पर आधारित आदर्श शासन का प्रतीक है, जिसमें न कोई दुखी है, न दरिद्र और न ही असमानता।
राम भारतीय जनमानस में गहराई से रचे-बसे हैं। अभिवादन से लेकर आस्था तक, जीवन के हर पहलू में उनका नाम मौजूद है। महात्मा गांधी ने भी ‘रामराज्य’ को आदर्श शासन के रूप में देखा था।
इस प्रकार, राम केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन, नैतिकता और सांस्कृतिक एकता के आधार स्तंभ हैं।