लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
प्राकृतिक संसाधन—जल, वायु, वन, खनिज, मिट्टी, जीव-जंतु और ऊर्जा स्रोत—मानवता की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की साझा धरोहर हैं। यह केवल नैतिक विचार नहीं, बल्कि पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास, जैविक विकास और आधुनिक विज्ञान का स्थापित निष्कर्ष है।
विज्ञान बताता है कि जिन ऊर्जा स्रोतों पर आधुनिक सभ्यता निर्भर है, वे मानव जीवनकाल में पुनः निर्मित नहीं हो सकते। पेट्रोलियम बनने में करोड़ों वर्ष लगते हैं, कोयला और प्राकृतिक गैस भी लाखों-करोड़ों वर्षों की प्रक्रिया का परिणाम हैं। ऐसे संसाधनों को कुछ वर्षों के लालच, युद्ध या अंधाधुंध उपभोग में नष्ट करना न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से अविवेकपूर्ण है, बल्कि नैतिक रूप से भी अनुचित है।
भारतीय चिंतन ने इस सत्य को प्राचीन काल से स्वीकार किया है। अथर्ववेद में कहा गया है—“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”, अर्थात पृथ्वी हमारी माता है। इसी तरह उपनिषद का “ईशावास्यमिदं सर्वं” सम्पूर्ण सृष्टि को साझा अस्तित्व के रूप में देखता है। आधुनिक संदर्भ में इसे ‘वैश्विक साझा संसाधन’ कहा जा सकता है।
प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार का विचार मूलतः अमानवीय है। मनुष्य केवल इनका संरक्षक (ट्रस्टी) हो सकता है, स्वामी नहीं। एक संरक्षक का कर्तव्य संरक्षण है, न कि दोहन। लेकिन वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में संसाधन संपत्ति, राजनीतिक शक्ति और भू-रणनीतिक हथियार बन गए हैं।
पश्चिम एशिया में तेल संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान गैस आपूर्ति संकट, और अफ्रीका में खनिज संसाधनों को लेकर संघर्ष—ये सभी उदाहरण दिखाते हैं कि संसाधनों का दुरुपयोग वैश्विक अस्थिरता को जन्म देता है।
इसका प्रभाव व्यापक होता है—ईंधन महंगा होता है, परिवहन लागत बढ़ती है, बिजली दरें ऊँची होती हैं और खाद्य संकट गहराता है। सबसे अधिक पीड़ा उस आम जन को झेलनी पड़ती है, जिसका इन संघर्षों से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता।
प्राकृतिक संसाधनों की हानि केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि पारिस्थितिक असंतुलन भी पैदा करती है। जंगलों की कटाई से वर्षा चक्र और जैव विविधता प्रभावित होती है, जबकि समुद्र में तेल रिसाव से जलवायु संकट और समुद्री जीवन दोनों को खतरा होता है।
भारतीय दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम्” के माध्यम से यह सिखाता है कि पूरी पृथ्वी एक परिवार है। संसाधनों का उपयोग समानता, संयम और कल्याण के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।
आधुनिक पर्यावरणीय न्याय की अवधारणा भी इसी दिशा में संकेत करती है, जिसमें संसाधनों की समान उपलब्धता और संरक्षण को आवश्यक माना गया है।
महात्मा गांधी का न्यास सिद्धांत इस विचार को और स्पष्ट करता है कि संसाधनों का उपयोग लोकहित में होना चाहिए, न कि स्वार्थ के लिए।
यदि किसी देश या क्षेत्र में अधिक संसाधन हैं, तो उसका दायित्व उनके संरक्षण और संतुलित उपयोग का है। मानवता को यह समझना होगा कि वह पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि संरक्षक है—और यही सोच भविष्य के सतत विकास की आधारशिला बन सकती है।