लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
ऋचा बर्नवाल
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि राजनीतिक व्यंग्य (political satire) को अपने आप में मानहानि नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक नेताओं और जनप्रतिनिधियों को आलोचना, हास्य और व्यंग्य का सामना करना पड़ता है, और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी राजनीतिक गतिविधियों और निर्णयों पर होने वाली आलोचना को सहन करें। कोर्ट ने कहा कि हर असहज या नकारात्मक टिप्पणी को मानहानि के दायरे में नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब वह राजनीतिक फैसलों या सार्वजनिक कार्यों से जुड़ी हो।
हालांकि, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सभी प्रकार की सामग्री संरक्षित नहीं है। यदि कोई सामग्री अश्लील, अत्यधिक आपत्तिजनक या किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचाने वाली हो, तो उस पर कार्रवाई की जा सकती है।
इस मामले में अदालत ने राघव चड्ढा की याचिका पर आंशिक राहत देते हुए कुछ आपत्तिजनक पोस्ट हटाने के आदेश दिए, जबकि बाकी सामग्री को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में माना।