लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को लेकर हुए विवाद ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली फिल्मों पर सेंसर बोर्ड की निगरानी होती है।
सामान्य तौर पर सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्मों को Central Board of Film Certification (CBFC) से सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता है। लेकिन OTT प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेंट के लिए CBFC की वही प्रक्रिया लागू नहीं होती। OTT कंटेंट सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत लागू Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 के दायरे में आता है, जिसमें प्लेटफॉर्म को सेल्फ-रेगुलेशन और शिकायत निवारण व्यवस्था का पालन करना होता है।
'सतलुज' के मामले में फिल्म पहले सेंसर बोर्ड से जुड़े विवादों के कारण लंबे समय तक अटकी रही। इसके बाद इसे OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज किया गया, लेकिन कुछ ही समय बाद भारत में इसकी स्ट्रीमिंग रोक दी गई, जिसके बाद सेंसरशिप और डिजिटल कंटेंट की स्वतंत्रता को लेकर बहस शुरू हो गई।
OTT पर सेंसर बोर्ड की सीधी कैंची नहीं चलती, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्लेटफॉर्म पूरी तरह नियमों से बाहर हैं। सरकार और संबंधित संस्थाएं कानूनी प्रावधानों के तहत किसी कंटेंट पर कार्रवाई कर सकती हैं, खासकर जब सुरक्षा, कानून व्यवस्था या अन्य संवेदनशील मुद्दों का हवाला दिया जाए।
'सतलुज' विवाद ने यह बहस तेज कर दी है कि OTT के लिए मौजूदा सेल्फ-रेगुलेशन व्यवस्था पर्याप्त है या डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए अलग सेंसरशिप व्यवस्था होनी चाहिए। फिल्म इंडस्ट्री के कई लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि अन्य लोग संवेदनशील विषयों पर जिम्मेदारी की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।