लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
महिला आरक्षण विधेयक पर लोकसभा में हुई हालिया वोटिंग ने भारतीय राजनीति के एक बड़े विरोधाभास को उजागर कर दिया है। एक ओर सभी दल सार्वजनिक मंचों पर महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर निर्णायक क्षणों में राजनीतिक गणित इस मुद्दे पर भारी पड़ता नजर आता है।
विधेयक को पारित करने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि संसद में व्यापक सहमति अभी भी दूर है। यह स्थिति केवल किसी एक दल की हार या जीत नहीं, बल्कि उन करोड़ों महिलाओं की उम्मीदों पर असर डालती है, जो राजनीति में अधिक प्रतिनिधित्व चाहती हैं।
विपक्षी दलों ने विधेयक के क्रियान्वयन के तरीके—विशेषकर परिसीमन से जुड़े प्रावधानों—पर आपत्ति जताई। Rahul Gandhi ने इसे “छलावा” बताया, जबकि अन्य नेताओं ने भी सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन के मुद्दे उठाए।
वहीं, Akhilesh Yadav ने महिला आरक्षण के भीतर विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व की मांग की, जिसे लेकर बहस और गहरी हो गई।
सवाल यह उठता है कि क्या इस तरह की शर्तें विधेयक को बेहतर बनाने का प्रयास थीं या फिर प्रक्रिया को टालने का माध्यम? कई विशेषज्ञ मानते हैं कि पहले विधेयक पारित कर, बाद में संशोधन लाना एक अधिक व्यावहारिक रास्ता हो सकता था।
दूसरी ओर, सत्ता पक्ष पर भी सवाल उठते हैं कि यदि पूर्व में पर्याप्त बहुमत था, तो इस दिशा में पहले ठोस पहल क्यों नहीं की गई। यह बहस बताती है कि मुद्दा केवल विपक्ष या सत्ता पक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि समग्र राजनीतिक इच्छाशक्ति से जुड़ा है।
राज्यों के स्तर पर देखें तो कुछ जगहों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के सफल उदाहरण भी सामने आए हैं। Madhya Pradesh में पंचायत स्तर पर महिलाओं की भागीदारी 50 प्रतिशत से अधिक है, जो दर्शाता है कि इच्छाशक्ति होने पर बदलाव संभव है।
पूरे घटनाक्रम से यह साफ संकेत मिलता है कि भारतीय राजनीति में महिला सशक्तिकरण अभी भी एक अधूरा एजेंडा है। यह मुद्दा अक्सर चुनावी वादों में तो प्रमुखता पाता है, लेकिन नीतिगत सहमति के स्तर पर ठोस कदम अभी बाकी हैं।