गुरप्रीत कालरा
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
राजस्थान उच्च न्यायालय ने आपराधिक मामलों में पीड़ित पक्ष के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि दोषी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके वारिसों को अपील जारी रखने का अधिकार दिया जाता है, तो पीड़ित की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों को इस अधिकार से वंचित रखना संविधान के विपरीत और भेदभावपूर्ण है।
अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था समानता के अधिकार के खिलाफ है और इसमें संशोधन की आवश्यकता है। जस्टिस Anoop Kumar की एकलपीठ ने यह आदेश शिमला शर्मा की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों द्वारा दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि वर्तमान कानूनी प्रावधानों के तहत दोषी पक्ष के वारिसों को अपील जारी रखने की अनुमति है, लेकिन पीड़ित पक्ष के परिवार को ऐसा अधिकार नहीं दिया गया है। यह न्याय के मूल सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के अनुरूप नहीं है।
अदालत ने विधायिका से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 394 में संशोधन पर विचार करने को कहा है। न्यायालय ने सुझाव दिया कि जिस प्रकार आरोपित पक्ष के कानूनी वारिसों को अपील जारी रखने या अपील दायर करने का अधिकार प्राप्त है, उसी प्रकार मृतक पीड़ित के उत्तराधिकारियों को भी यह अधिकार मिलना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह केवल एक तकनीकी कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि पीड़ितों के न्याय के अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय है। यदि पीड़ित की मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार को न्याय की प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही अदालत ने अपने आदेश की प्रति विधि आयोग (Law Commission of India) को भी भेजी है। कोर्ट ने विधि आयोग से कहा है कि वह इस विषय पर विचार कर विधायिका को आवश्यक संशोधन के लिए सुझाव दे, ताकि पीड़ित परिवारों को भी कानूनी सुरक्षा और न्याय का समान अवसर मिल सके।
क्या है पूरा मामला
मामला जयपुर के कानोता थाना क्षेत्र से जुड़ा है। शिमला शर्मा ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके दादा गोविंद नारायण के नाम 1 बीघा 5 बिस्वा जमीन थी। उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उनकी मृत्यु के बाद शिकायतकर्ता के पिता भन्नालाल शर्मा उनके वैध उत्तराधिकारी बने।
शिकायत के अनुसार, विरोधी पक्ष ने ग्राम सरपंच के साथ मिलीभगत कर राजस्व रिकॉर्ड में जमीन अपने नाम दर्ज करवा ली। इस कथित धोखाधड़ी को लेकर मामला दर्ज कराया गया था।
हालांकि दिसंबर 2012 में निचली अदालत ने विरोधी पक्ष को बरी कर दिया। इस फैसले के खिलाफ जयपुर महानगर की एडीजे क्रम-8 कोर्ट में अपील दायर की गई।
सितंबर 2013 में अपीलकर्ता शिमला शर्मा की मृत्यु हो गई। इसके बाद विरोधी पक्ष ने यह आपत्ति उठाई कि पीड़ित की मृत्यु के बाद उसके वारिस अपील जारी नहीं रख सकते और अपील समाप्त मानी जानी चाहिए।
इसी मुद्दे पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान कानूनी स्थिति असंतुलित है और इसमें सुधार की आवश्यकता है, ताकि न्याय केवल आरोपित के अधिकारों तक सीमित न रहे, बल्कि पीड़ित पक्ष को भी समान अवसर मिल सके।
अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में पीड़ित अधिकारों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ बन सकती है।