गुरप्रीत कालरा
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
पश्चिमी राजस्थान की तपती रेत से उठी पशुपालकों और किसानों की पीड़ा अब आस्था के दरबार तक पहुंचने जा रही है। तनोट माता मंदिर से 21 जनवरी को शुरू हुई ओरण-गोचर भूमि बचाने की पदयात्रा तीन माह का लंबा सफर तय कर जयपुर पहुंच चुकी है। इस यात्रा में सैकड़ों किसान और पशुपालक शामिल हैं, जो अपनी पारंपरिक जमीनों और जल स्रोतों को बचाने की मांग उठा रहे हैं।
पदयात्रियों की मुख्य मांग ओरण देव वन, गोचर भूमि, तालाब, खड़ीन, आगोर और प्राचीन कुओं को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कर संरक्षण सुनिश्चित करने की है। उनका कहना है कि ये संसाधन केवल जमीन का हिस्सा नहीं, बल्कि उनकी आजीविका, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों का आधार हैं।
यात्रा में शामिल सुमेर सिंह और भोपाल सिंह ने बताया कि उन्होंने कई बार प्रशासन और सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। तीन महीने की लंबी पदयात्रा के बावजूद अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है, जिससे लोगों में निराशा बढ़ी है।
पदयात्रियों का कहना है कि सरकारी उदासीनता के कारण जैसलमेर जिले में लाखों पशुओं के लिए प्राकृतिक चारागाहों पर संकट गहराता जा रहा है। यदि समय रहते इन भूमि और जल स्रोतों को संरक्षित नहीं किया गया, तो पशुधन और ग्रामीण जीवन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
अब यह पदयात्रा जयपुर से अयोध्या के लिए रवाना होगी, जहां पदयात्री भगवान श्रीराम के समक्ष अपनी पीड़ा का ज्ञापन प्रस्तुत करेंगे। उनका कहना है कि जब शासन-प्रशासन से उम्मीद टूटने लगती है, तो आस्था ही अंतिम सहारा बनती है।
पदयात्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि अयोध्या यात्रा के बाद भी उनकी मांगों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो वे वापस लौटकर बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू करेंगे। यह पदयात्रा अब केवल मांगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की एक बड़ी लड़ाई का प्रतीक बन गई है।