लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
नई दिल्ली: सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध पुरातात्विक खोजों में शामिल 'डांसिंग गर्ल' प्रतिमा एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा जारी कला पुस्तक 'मधुरिमा' में इस प्रतिमा की तस्वीर को डिजिटल शेडिंग और रंगों के माध्यम से आंशिक रूप से धुंधला दिखाए जाने के बाद विवाद और बहस शुरू हो गई है।
'डांसिंग गर्ल' लगभग 4500 वर्ष पुरानी कांस्य प्रतिमा है, जिसे 1926 में वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत स्थित मोहनजोदड़ो पुरातात्विक स्थल से खोजा गया था। यह प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता की कला, शिल्प कौशल और सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।
भारत के विभाजन से पहले मोहनजोदड़ो अविभाजित भारत का हिस्सा था। विभाजन के बाद यह क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। बताया जाता है कि विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान के बीच पुरावशेषों के बंटवारे की प्रक्रिया हुई थी। इसी दौरान 'डांसिंग गर्ल' प्रतिमा भारत के हिस्से में आई, जबकि मोहनजोदड़ो से प्राप्त कुछ अन्य महत्वपूर्ण अवशेष पाकिस्तान के पास रहे।
करीब 10.5 सेंटीमीटर ऊंची यह प्रतिमा कांसे से बनी है और इसमें एक युवा नर्तकी को आत्मविश्वासपूर्ण मुद्रा में दर्शाया गया है। कला इतिहासकार इसे प्राचीन भारतीय उपमहाद्वीप की उत्कृष्ट धातु शिल्पकला का अद्भुत उदाहरण मानते हैं।
हाल ही में एनसीईआरटी की पुस्तक में प्रतिमा की छवि को संशोधित रूप में प्रकाशित किए जाने के बाद शिक्षाविदों, इतिहासकारों और कला विशेषज्ञों के बीच बहस छिड़ गई है। आलोचकों का कहना है कि ऐतिहासिक कलाकृतियों को उनके मूल स्वरूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि शैक्षणिक सामग्री के लिए यह संपादकीय निर्णय हो सकता है।
फिलहाल यह बहस केवल एक प्रतिमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इतिहास, कला शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत की प्रस्तुति को लेकर व्यापक चर्चा का विषय बन गई है।