विवाद का वहां कोई अर्थ नहीं जहाँ सामने वाला ज्ञान और अनुभव में आपके समान न हो

जल्द ही मेट्रो के स्मार्ट कार्ड से बस में खरीद सकेंगे टिकट आत्मविश्वास से भरी किंग्स इलेवन पंजाब से दिल्ली कैपिटल्स को रहना होगा बचकर किसान को MSP से नीचे अनाज बेचने पर मजबूर किया तो 3 साल जेल PM मोदी आज शाम 6 बजे देश को देंगे संदेश अब मेट्रो में मास्क नहीं पहनने पर कटेगा भारी चलन नवरात्रि 2020: आइए जानते है पूजा में पान के पत्‍ते और लौंग का महत्व सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट, जानिए क्या है भाव CM अरविंद केजरीवाल ने बाढ़ प्रभावित हैदराबाद के लिए 15 करोड़ मदद की घोषणा की भारत में कोविड-19 संक्रमण की रफ्तार में आई कमी बिहार: आज पहली चुनावी रैली से गरजेंगे योगी आदित्यनाथ 5G सेवा शुरू करने के लिए मुंबई और दिल्ली को अरब रुपये से अधिक करने पड़ेंगे खर्च Special Trains : आज से शुरू हुईं 392 स्‍पेशल ट्रेन Punjab Assembly-कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब विधानसभा में तीन बिल पेश आज का राशिफल जाने दुनिया के वो 5 देश, जहां सबसे ज्यादा है भुखमरी जाने भारत में 'प्रथम' भारतीय महिलाओं का इतिहास कलकत्ता हाई कोर्ट ने महामारी के चलते दुर्गा पूजा पंडालों में लगाया प्रतिबंध क्या दिल्ली में फिर बढ़ रहा है प्रदूषण CM शिवराज ने सोनिया गांधी को पत्र लिख कड़ी कार्रवाई की मांग नाक से दी जाने वाली वैक्सीन का देश में फाइनल ट्रायल जल्द

विवाद का वहां कोई अर्थ नहीं जहाँ सामने वाला ज्ञान और अनुभव में आपके समान न हो

Shweta Chauhan 18-07-2019 15:05:04

अक्सर रोजमर्रा के जीवन में ऐसा होता है कि हम कई बार कुछ ऐसे लोगों की बात पर क्रोध करने लगते हैं, जो ना ज्ञान में हमसे आगे होते हैं ना अनुभव में। कई लोग अपनी थोड़ी से योग्यता के अहंकार में आपका अपमान करते हैं। ज्यादातर लोग ऐसे मौकों पर अपना धैर्य खो देते हैं, और मामला विवाद तक पहुंच जाता है। हमारे ग्रंथ कहते हैं क्रोध और विवाद उन पर करें जो आपकी योग्यता के समान हो। जो आपकी तरह योग्य नहीं हो, आपसे काफी कमतर हो, उसके साथ विवाद और क्रोध करने में आपकी ही हानि है। ऐसे लोगों को सामान्य तरीकों से समझाना चाहिए। भगवान शिव और रावण का एक प्रसंग है, जब रावण के मूर्खतापूर्ण काम पर शिव ने क्रोध नहीं किया, बल्कि खेल-खेल की तरह ही उसे सबक सिखा दिया।  

एक प्रसिद्ध कथा है रावण और भगवान शिव की। कई पौराणिक मान्यताओं ने रावण को शिव का सबसे श्रेष्ठ भक्त बताया है। रावण ने शिव को अपना ईष्ट और गुरु दोनों माना था। एक दिन रावण के मन में आया कि मैं सोने की लंका में रहता हूं और मेरे आराध्य शिव कैलाश पर्वत पर। क्यों ना भगवान शिव को भी लंका में लाया जाए। ये सोचकर रावण कैलाश पर्वत की ओर निकल पड़ा। वो कई तरह के विचारों में डूबा हुआ कैलाश पर्वत की तलहटी में पहुंचा। 

सामने से भगवान शिव के वाहन नंदी आ रहे थे। नंदी ने शिव भक्त रावण को प्रणाम किया। रावण ने अहंकार में कोई जवाब नहीं दिया। नंदी ने फिर उससे बात की तो रावण ने उसका अपमान कर दिया। उसने नंदी को बताया कि वो भगवान शिव को लंका लेकर जाने के लिए आया है। नंदी ने कहा, भगवान को कोई उनकी इच्छा के विरुद्ध कहीं नहीं ले जा सकता। रावण को अपने बल पर घमंड था। उसने कहा अगर भगवान शिव नहीं माने, तो वो पूरा कैलाश पर्वत ही उठाकर ले जाएगा। 

इतना कह कर उसने कैलाश पर्वत को उठाने के लिए अपना हाथ एक चट्टान के नीचे रखा। भगवान शिव कैलाश पर्वत पर बैठे सब देख रहे थे। कैलाश हिलने लगा। सारे गण डर गए। लेकिन, भगवान शिव अविचलित बैठे रहे। जब रावण ने अपना पूरा हाथ कैलाश पर्वत की चट्टान के नीचे फंसा दिया तो भगवान ने मात्र अपने पैर के अंगूठे से कैलाश को दबा दिया। रावण का हाथ कैलाश पर्वत के नीचे फंस गया। निकल नहीं पा रहा था। शिव अपने आसन पर निर्विकार बैठे मुस्कुरा रहे थे। तब रावण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव तांडव स्तोत्र की रचना की। जिसे सुनकर शिव ने उसे मुक्त किया। 


  • |

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :