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कृषि और इसकी दयनीय स्थिति जानिये क्यों है बुरे हालात

Shweta Chauhan 12-06-2019 15:02:59



भारत कृषि के मामले में स्वंतंत्र्ता प्राप्ति के समय से ही एक आत्मनिर्भर राष्ट्र रहा है क्योंकि भारत ने भुखमरी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना किया है वो कहते है एक नन्हा बालक जब चलना सीखता है तो कई बार गिरता है उसके बाद ही वह अपने पैरो पर खड़े होना सीखता है ठीक यही दशा भारत की आज़ादी के समय थी जिसके कारण भारत ने दुसरे राष्ट्रों पर निर्भर रहने से बेहतर आत्मनिर्भरता के विकल्प को चुना और ये विकल्प भारत की कृषि व्यवस्था में कारगार कदम साबित हुआ और समय के साथ तकनीकी विकास ने जो गति की तीव्रता पकड़ी वो तो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी फिर कुछ आप्रकृतिक घटनाएं और विकास की होड़ ने कृषि को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया। इन घटनाओं में सबसे पहले हम जलवायु परिवर्तन को लेंगे जिसके कारण मौसम के फेरबदल ने इसकी रूपरेखा ही बदल डाली।

दूसरी घटना थी औद्यौगिक क्रांति जिसमे व्यापार पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा और कृषि व्यवस्था पिछड़ गयी और कई तरह समस्याएं उत्पन्न हुई.

 बीतें कुछ सालों से किसानों का हर रोज़ सड़कों पर आ जाना और अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करना एक आम बात हो गयी है. इसके कई कारण हो सकते है या तो सरकार कृषि की ओर ध्यान नहीं दे रहे है या फिर किसान क़र्ज़ माफ़ी और मांगो को पूरा करवाने में आदत से मज़बूर है, पर भारत जैसे कृषि प्रधान देश जहाँ 52% भाग कृषि पर आधारित हो वहां कृषि को अनदेखा किया जाना इसे हाशिये पर ला खड़ा कर सकता है और किसानों की क़र्ज़ से सम्बंधित समस्या एक को होगी या दो को होगी सभी का सड़कों पर आ जाना इस बात को दर्शाता है कि कहीं न कहीं चूक है ये चूक प्रशासन में हो या सरकार की योजनाओं में लेकिन परेशानी किसानों को झेलनी पड़ रही है.

किसानों की आत्महत्या का मामला

 एक रिपोर्ट के मुताबिक एनडीए के नेतृत्व वाली सरकार में कृषि के लिए कुछ ख़ास काम नहीं किये गए जिसके कारण किसानों की आत्महत्यायों की घटनाएं और अधिक बढ़ गयी है. केंद्र में एनडीए के शासनकाल (1999-2003) के दौरान देश में कुल 84,235 किसानों ने आत्महत्या की। उससे पहले के 5 सालों (1994-99) के मुकाबले यह 31 फीसदी की बढ़ोतरी थी। यूपीए-1 के 5 सालों में यह आंकड़ा 2 फीसदी बढ़कर 85,960 हुआ, जबकि यूपीए-2 में यह 13 फीसदी नीचे आया। वर्तमान आंकड़ों की बात करे तो हर दिन करीब 22 किसान आत्महत्या करते है. जिसमे सबसे ज्यादा घटनाएं महाराष्ट्र में देखने को मिली।

इन आकड़ों को देखकर साफ़ ज़ाहिर होता है कि वाकई में कमी कहीं तो है किसानों की अपनी ज़िन्दगी गवां देने का सबसे बड़ा कारण है क़र्ज़, क्योंकि बैंक को सही समय पर लोन न चुका पाने के कारण उनपर बोझ बढ़ता जाता है और आर्थिक स्थिति बद से बद्तर हो जाती है जिसके चलते किसान आत्महत्या करने पर मज़बूर हो जातें है. 

दूसरा कारण msp यानी minimum support price जो की सरकार द्वारा किसानों के लिए तय किया जाता है और तय की गयी राशि पर उनकी फसलों को सरकार खरीदती है. यह रेट जितना कम  होता है किसानों को उतना ही नुकसान झेलना पड़ता है. और अभी तक जितने भी प्रदर्शन हुए है उन सभी में यह बात समान है कि किसानों को न्यूनतम मूल्य के आधार पर उचित दाम नहीं मिल रहा है जिससे उन्हें नुकसान झेलना पड़ रहा है.

तीसरा यह कि 60 साल के बाद किसानों को सही पेंशन न मिलना सुसाइड के कारणों में शामिल है हर बार किसानों की सरकार से यही अपील रहती है कि वृद्ध किसानों के लिए कुछ सुविधाएं दी जाए जिससे उनकी बाकी की ज़िन्दगी में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े.

कांग्रेस काल में किसानों की स्थिति: 

इन सभी मामलों को देखते हुए कांग्रेस सरकार ने इनके लिए वायदे किये और कुछ हद तक इन्हे पूरा भी किया पिछले वर्ष राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने यह वायदा किया था कि यदि वे सत्ता में आते है तो किसानों का कर्ज 10 दिन के अंदर माफ़ कर दिया जाएगा और मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में किसानों को 50,000 हज़ार करोड़ के बजट के साथ ऋण मुक्ति देना एक ऐतिहासिक कदम था भले ही सरकार पर इसका भार अधिक पड़ा हो पर कर्जमाफी से उनकी स्थिति में सुधार आना संभव है. आंकड़ों के मुताबिक सरकार इस पहल का करीब 55 लाख किसानों को फायदा पहुंचा है

इसी साथ कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के दौरान अपने घोषणापत्र में भी किसानों के कई मुख्य ऐलान किये थे  उनमे सबसे पहला वादा था कर्जमाफी से कर्जमुक्ति की ओर कदम, किसानों के लिए हर वर्ष एक अलग बजट बनाने की योजना साथ ही कृषि से सम्बंधित सभी दृष्टिकोण से इसे सुधारने का प्रयास किया जाएगा। 

हालाँकि कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव में भारी मतों से हार का सामना करना पड़ा पर उसके बावजूद उनके घोषणापत्र में शामिल इन वादों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

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