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कहाँ गयी वो 'बिलाती पाती' चिठ्ठियां

Deepak Chauhan 13-05-2019 19:29:15



पुराने सामान की सफाई में मुझे एक चिट्ठी मिली. वह प्रेमपत्र था. उसका रंग गुलाबी से पीला पड़ गया था, पर खुशबू बनी हुई थी. मैंने कोई सत्ताईस बरस पहले इसे अपनी पत्नी को लिखा था. वे विश्वविद्यालयी दिन थे. तब वे पत्नी नहीं बनी थी. विवाह के बाद पत्र लिखने का न सामर्थ्य बचता है न शक्ति. भावना और संवेदना जरूर हिलोरें मारती हैं, लेकिन उनमें वह आवेग नहीं होता. फिर सूचना क्रांति हुई. एसएमएस का युग आ गया और चिट्ठी हमारे जीवन से चली गई. लोग अब चिट्ठयां लिखना भूल भी गए हैं. एक ताकतवर विधा का बेवक्त अंत हुआ। 

जब से लिपि की खोज हुई, तभी से चिट्ठियां दो लोगों के बीच संवाद का विश्वसनीय जरिया रहीं. ‘संदेशो देवकी से कहियो’ से लेकर ‘मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज न होना’ तक की यात्रा चिट्ठियों की इतिहास-यात्रा है. साहित्य के रीतिकाल में तो प्रेम की तमाम अवस्थाओं का वर्णन इन्हीं संदेशों के जरिए हुआ है. माना जाता है कि दुनिया का पहला पत्र 2009 ईसा पूर्व बेबीलोन के खंडहरों में मिला था. वह भी प्रेमपत्र था. मिट्टी की पट्टी पर लिखा. प्रेमिका के न मिलने पर प्रेमी ने मिट्टी के फर्श पर ही लिख डाला था. दो पंक्ति के इस पत्र में विरह की तड़प थी। 

मय के साथ इन पत्रों को लाने-ले जाने के जरिए भी बदले, लेकिन चिट्ठी ताकतवर होती गई. उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक कबूतर के जरिए संदेश भेजे जाते थे. खासकर होमिंग प्रजाति के कबूतरों का इस काम में इस्तेमाल होता था, जिनकी खासियत थी कि वे जहां से उड़ते, वहीं लौटकर आ जाते थे. इससे संदेश पहुंचने की पुष्टि होती थी. होमिंग सोलह सौ किलोमीटर तक बिना रास्ता भटके वापस लौट सकते थे. हमारे देश में डाक सेवा व्यवस्थित रूप से 1854 में लॉर्ड डलहौजी के जमाने में शुरू हुई. हालांकि सबसे पहली डाक सेवा ब्रिटेन में शुरू हुई थी। 

पत्रों से संवेदनाओं का गहरा रिश्ता रहा है. जब सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में जा रही थीं तो उनके साथ पिता के हिंदी में लिखे पत्र भी थे. दुनिया का राजनीतिक और सामाजिक इतिहास भी पत्रों के बिना अधूरा है. मार्क्स और एंगेल्स के बीच ऐतिहासिक दोस्ती की शुरुआत भी पत्रों के जरिए हुई थी. महात्मा गांधी एक साथ दोनों हाथों से चिट्ठियां लिखते थे. जवाहरलाल नेहरू ने जेल से ही चिट्ठियों के जरिए इंदिरा गांधी को राजनीतिक प्रशिक्षण दिया था। 

बाद में भी यह परंपरा जारी रही. इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी को दून स्कूल में चिट्ठियां भेजकर देश के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवेश की जानकारी दी. अब चिट्ठी लिखी ही नहीं जाती. इसलिए लिफाफा देख मजमून भांपनेवाली पूरी जमात का अस्तित्व खतरे में है. सेलफोन और कंप्यूटर से कुछ भांपा नहीं जा सकता. संचार क्रांति से दुनिया तो करीब आ गई है, पर इसने दिलों की दूरियां बढ़ा दी हैं. पुराने पत्रों के जरिए अतीत में लौटने और भावनाओं में विचरने का आनंद ही कुछ और है। 

चिट्ठयों के साथ एक और व्यक्ति हमारे समाज और जीवन से गायब हुआ. वह है डाकिया. आज की कूरियरवाली पीढ़ी खाकी वर्दीवाले डाकिए को शायद पहचान भी न पाए. एक जमाना था, जब घरों में डाकिए का बेसब्री से इंतजार होता था. उसके लंबे झोले में हंसने और रोने, दोनों के सामान रहते थे. निदा फाजली कहते हैं-

सीधा-सादा डाकिया जादू करे महान

एक ही थैले में रखे आंसू और मुस्कान

मेरे मुहल्ले के डाक चचा अब्दुल मुझे चिट्ठयों के साथ रोज कुछ-न-कुछ नई जानकारी देते थे. उन्होंने ही मुझे बताया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन कभी पोस्टमैन थे। 

कालांतर में चिट्ठयों से रसतत्त्व तो गायब हुआ, पर वह भूमिका बदल वापस लौटा. इन दिनों चिट्ठयां पोल खोलने का जरिया बन गई हैं. पोल खोलने की पहली चिट्ठी कमलापति त्रिपाठी ने राजीव गांधी को लिखी थी. त्रिपाठीजी चिट्ठी लिखने के पंडित थे. नाराज राजीव गांधी ने उन्हें कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष पद से हटा दिया. ऑस्ट्रेलिया के जुलियन असांजे ने विकीलिक्स के जरिए दुनिया भर के पत्राचार में सेंध लगा दी। 

कोयला आवंटन में नेताओं की चिट्ठियों ने एक मंत्री की पोल खोल दी! एक जनरल साहब ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर बम फोड़ा कि सेना के गोला-बारूद खत्म हो रहे हैं. अन्ना हजारे की चिट्ठियों ने मनमोहन सिंह की नींद उड़ा दी थी. कपिल सिब्बल को लिखी आचार्य बालकृष्ण की एक चिट्ठी से बाबा रामदेव के आंदोलन की हवा निकल गई. दरअसल चिट्ठियों की भूमिका बदल गई है. इनका इस्तेमाल अब मूर्तिभंजन के लिए हो रहा है। 

प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है. बाकी का वक्त लिखने के बाद उसे पहुंचाने में लगता था. लोगों में अब इतना धैर्य नहीं रहा. जमाना तुरंत का है. एसएमएस और बीबीएम पत्रों के लिए चुनौती बनकर आए. भेजते ही ये फौरन ‘इनबॉक्स’ में टन्न से गिरते हैं. ऐसे में पत्रों की अकाल मौत हुई. जब दिल की बात मुंह तक नहीं आ पाती थी तो पत्र ही जरिया बनते थे. पर शायद दिल की जगह दिमाग से आजकल काम चलता है। 


(यह लेख हेमंत शर्मा की पुस्तक 'तमाशा मेरे आगे' से लिया गया है. पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है)

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