नये कृषि विधेयक : हक मार, हक दिलाने का दावा

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नये कृषि विधेयक : हक मार, हक दिलाने का दावा

Sandeep Tripathi 22-09-2020 17:28:04

 डॉ. पीयूष शुक्ल 

कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल 2020 और कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक, 2020 रविवार 20 सितंबर 2020 को राज्यसभा में ध्वनिमत से पास हुए।

नया कृषि विधेयक क्या है? और किसान इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?

इसको जानने से पहले हमें MSP यानि कृषि उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य को जानना होगा,जो केंद्र सरकार तय करती है।

किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू है।

अगर कभी फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके।

किसी फसल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है और इसके तहत अभी 23 फसलों की खरीद की जा रही है।

कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की अनुशंसाओं के आधार पर एमएसपी तय की जाती है।

कैसे तय होती है फसलों की कीमत

अब सबसे जरूरी बात, फसलों की कीमत कैसे तय होती है और तय करता कौन है?

वर्ष 2009 से कृषि लागत और मूल्य आयोग एमएसपी के निर्धारण में लागत, मांग, आपूर्ति की स्थिति, मूल्यों में परिवर्त, मंडी मूल्यों का रुख, अलग-अलग लागत और अन्तरराष्ट्रीय बाजार के मूल्यों के आधार पर किसी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करता है।

कृषि मंत्रालय यह भी कहता है कि खेती के उत्पादन लागत के निर्धारण में नकदी खर्च ही नहीं बल्कि खेत और परिवार के श्रम का खर्च (बाजार के अनुसार) भी शामिल होता है।

मतलब खेतिहर मजदूरी दर की लागत का ख्याल भी एमएसपी तय करने समय रखा जाता है।

एमएसपी का आकलन करने के लिए सीएसीपी खेती की लागत को तीन भागों में बाँटता है।

ए2, ए2+एफएल और सी2

ए2 में फसल उत्पादन के लिए किसानों द्वारा किये गये सभी तरह के नकदी खर्च जैसे- बीज, खाद, ईंधन और सिंचाई आदि की लागत शामिल होती है।

ए2+एफएल में नकद खर्च के साथ पारिवारिक श्रम यानी फसल उत्पादन लागत में किसान परिवार का अनुमानित मेहनताना भी जोड़ा जाता है।

वहीं सी2 में खेती के व्यवसायिक मॉडल को अपनाया जाता है।

इसमें कुल नकद लागत और किसान के पारिवारिक पारिश्रामिक के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है।

लागत से डेढ़ गुनी कीमत का था वादा

फरवरी 2018 में केंद्र सरकार की ओर से बजट पेश करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि अब किसानों को उनकी फसल का जो दाम मिलेगा, वह उनकी लागत का कम से कम डेढ़ गुना ज्यादा होगा।

सीएसीपी की रिपोर्ट देखेंगे तो पता चलता है कि अभी फसल की लागत पर जो एमएसपी तय किया जा रहा है वह ए2+एफएल है।

वर्ष 2004 में प्रो. एमएस स्वामीनाथन की अगुवाई में राष्ट्रीय किसान आयोग के नाम से जो कमेटी बनी थी उसने अक्टूबर 2006 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी।

रिपोर्ट में किसानों को सी2 लागत पर फसल की कीमत देने की वकालत की गई थी, जबकि ऐसा हो नहीं रहा।

बिहार का विशेष संदर्भ

बिहार में 2006 से एपीएमसी नहीं है।

इसके कारण होता ये है कि व्यापारी बिहार से सस्ते दाम पर खाद्यान्न खरीदते हैं और उसी चीज को पंजाब और हरियाणा में एमएसपी पर बेच देते हैं क्योंकि यहां पर एपीएमसी मंडियों का जाल बिछा हुआ है।

कृषि मंत्रालय के अनुसार बिहार में देश में सबसे ज्यादा 20 फीसदी जमीन पर मक्के की खेती दो बार होती है।

रबी सीजन में कुल उत्पादन का 80 फीसदी मक्का बिहार में पैदा होता है।

बिहार के 10 जिले समस्तीपुर, खगड़िया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और भागलपुर में देश के कुल मक्का उत्पादन का 30 से 40 प्रतिशत पैदावार होता है।

देश की मंडियों में मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,850, यह सरकार की तय की गई कीमत है लेकिन बिहार में इसके खरीद की कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है।

कृषि विधेयकों का विरोध क्यों हो रहा?

मोलभाव की क्षमता बगैर किसान को कैसा लाभ - यह अध्यादेश कहता है कि बड़े कारोबारी सीधे किसानों से उपज खरीद कर सकेंगे।

लेकिन ये यह नहीं बताता कि जिन किसानों के पास मोल-भाव करने की क्षमता नहीं है, वे इसका लाभ कैसे उठायेंगे?"

जिले में बेच नहीं पाता, दूसरे राज्य कैसे जायेगा

- सरकार एक राष्ट्र, एक मार्केट बनाने की बात कर रही है, लेकिन उसे ये नहीं पता कि जो किसान अपने जिले में अपनी फसल नहीं बेच पाता है, वह राज्य या दूसरे जिले में कैसे बेच पायेगा।

क्या किसानों के पास इतने साधन हैं और दूर मंडियों में ले जाने में खर्च भी तो आयेगा।"

-इस अध्यादेश की धारा 4 में कहा गया है कि किसान को पैसा तीन कार्य दिवस में दिया जाएगा।

किसान का पैसा फंसने पर उसे दूसरे मंडल या प्रांत में बार-बार चक्कर काटने होंगे।

न तो दो-तीन एकड़ जमीन वाले किसान के पास लड़ने की ताकत है और न ही वह इंटरनेट पर अपना सौदा कर सकता है।

यही कारण है किसान इसके विरोध में है।

पश्चिमी जगत में पहले से लागू, पर किसानों की आय घटी

- जिसे सरकार सुधार कह रही है वह अमेरिका, यूरोप जैसे कई देशों में पहले से ही लागू बावजूद इसके वहाँ के किसानों की आय में कमी आयी है।

अमेरिका कृषि विभाग के मुख्य अर्थशास्त्री का कहना है कि 1960 के दशक से किसानों की आय में गिरावट आयी है।

इन वर्षों में यहाँ पर अगर खेती बची है तो उसकी वजह बड़े पैमाने पर सब्सिडी के माध्यम से दी गयी आर्थिक सहायता है।

यदि सरकार इतना ही किसानों के हित को सोचती है तो उसे एक और अध्यादेश लाना चाहिए जो किसानों को एमएसपी का कानूनी अधिकार दे दे, जो ये सुनिश्चित करेगा कि एमएसपी के नीचे किसी से खरीद नहीं होगी। इससे किसानों का हौसला बुलंद होगा।

मंडी व्यवस्था का होगा खात्मा

- सरकार के इस फैसले से मंडी व्यवस्था ही खत्म हो जायेगी।

इससे किसानों को नुकसान होगा और कॉरपोरेट और बिचौलियों को फायदा होगा।

फॉर्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस में वन नेशन, वन मार्केट की बात कही जा रही है।

लेकिन सरकार इसके जरिये कृषि उपज विपणन समितियों (APMC) के एकाधिकार को खत्म करना चाहती है।

अगर इसे खत्म किया जाता है तो व्यापारियों की मनमानी बढ़ेगी, किसानों को उपज की सही कीमत नहीं मिलेगी।

विवाद निपटारा में पेंच

-व्यापारियों व किसानों के बीच अगर कोई विवाद हुआ तो "विवाद सुलझाने के लिए 30 दिन के अंदर समझौता मंडल में जाना होगा।

वहाँ न सुलझा तो धारा 13 के अनुसार एसडीएम के यहाँ मुकदमा करना होगा।

एसडीएम के आदेश की अपील जिला अधिकारी के यहां होगी और जीतने पर किसान को भुगतान किये जाने का आदेश दिया जायेगा।

देश के 85 फीसदी किसान के पास दो-तीन एकड़ जोत है।

विवाद होने पर उनकी पूरी पूंजी वकील करने और ऑफिसों के चक्कर काटने में ही खर्च हो जाएगी।

अपनी ही जमीन पर मजदूर बनेगा किसान

- इस नए अध्यादेश के तहत किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन के रह जायेगा।

इस अध्यादेश के जरिये केंद्र सरकार कृषि का पश्चिमी मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है।

लेकिन सरकार यह बात भूल जाती है कि हमारे किसानों की तुलना विदेशी किसानों से नहीं हो सकती।

क्योंकि हमारे यहां भूमि-जनसंख्या अनुपात पश्चिमी देशों से अलग है और हमारे यहां खेती-किसानी जीवनयापन करने का साधन है, वहीं पश्चिमी देशों में यह व्यवसाय है।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसानों का शोषण होता है।

पिछले साल गुजरात में पेप्सिको कम्पनी ने किसानों पर कई करोड़ का मुकदमा किया था जिसे बाद में किसान संगठनों के विरोध के चलते कम्पनी ने वापस ले लिया था।"

कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग में कम्पनियों की मनमानी

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत फसलों की बुआई से पहले कम्पनियाँ किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं।

लेकिन बाद में जब किसान की फसल तैयार हो जाती है तो कम्पनियाँ किसानों को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहती हैं और बाद में किसानों के उत्पाद को खराब बता कर रिजेक्ट कर दिया जाता है।

समझने की बात यह है कि हमारे देश में 85% लघु किसान हैं, किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है।

यानी यह अध्यादेश बड़ी कम्पनियों द्वारा कृषि उत्पादों की कालाबाज़ारी के लिए लाया गया है।

कम्पनियां और सुपर मार्केट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे।

जमाखोरी बढ़ेगी, खाद्यान्न पर सरकार का नियंत्रण नहीं

किसान संगठनों का कहना कि इस बदलाव से कालाबाजारी घटेगी नहीं बल्की बढ़ेगी। जमाखोरी बढ़ेगी।

भारतीय किसान यूनियन के महासचिव धर्मेंद्र मलिक कहते हैं कि इससे सरकार के हाथ में खाद्यान नियंत्रण नहीं रहेगा, सबसे बड़ा खतरा यही है।

वे कहते हैं, "सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बदलाव करके निजी हाथों में खाद्यान्न जमा होने की इजाजत दे दी है।

अब सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होगा।

कोरोना संकट के बीच यह नियंत्रण सरकार के हाथ में था, इसलिए लोगों को कम से कम अनाज को लेकर दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा।

इससे धीरे-धीरे कृषि से जुड़ी पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चौपट हो जायेगी।

निजी व्यापारी सप्लाई चेन को अपने हिसाब से तय करते हैं और मार्केट को चलाते हैं, जिसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ेगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं) - ( lokmaan.com से साभार)


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