Bandish Bandits Review: एक सुरीली सिरीज, जो मन को तृप्त कर देती है

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Bandish Bandits Review: एक सुरीली सिरीज, जो मन को तृप्त कर देती है

Gauri Manjeet Singh 07-08-2020 20:04:33

वेब सिरीज: बंदिश बैंडिट्स
निर्देशक : आनंद तिवारी
कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, श्रेया चौधरी, ऋत्विक भौमिक, शीबा चड्ढा, अतुल कुलकर्णी, राजेश तैलंग, कुणाल रॉय कपूर, अमित मिस्त्री, त्रिधा चौधरी, मेघना मलिक 
स्टार: 4

अमूमन अपराध, हिंसा और राजनीतिक पूर्वग्रहों से भरी वेब सिरीज के बीच ‘बंदिश बैंडिट्स’ मलय पर्वत से चलने वाली हवा की मानिंद सुगंध और ताजगी से भरी लगती है। जमाने के बाद संगीत पर आधारित कुछ ऐसा देखने को मिला है, जो रस में सराबोर कर देता है। 

यह कहानी है संगीत सम्राट राठौर घराने के पं. राधे मोहन राठौर (नसीरुद्दीन शाह) और उनके परिवार की, जिसमें उनका बड़ा बेटा राजेंद्र (राजेश तैलंग), बहू मोहिनी (शीबा चड्ढा), छोटा बेटा देवेंद्र (अमित मिस्त्री) और पोता राधे (ऋत्विक भौमिक) हैं। यह कहानी पॉप संगीत की उभरती कलाकार तमन्ना (श्रेया चौधरी) की भी है, जो पॉप संगीत में मुकाम बनाना चाहती है। पंडित जी बहुत सख्त हैं और संगीत को लेकर कोई समझौता नहीं करते। राधे पंडित जी का उत्तराधिकारी बनना चाहता है।

संयोग से एक दिन तमन्ना की मुलाकात राधे से हो जाती है। वह राधे की गायकी से इतना प्रभावित होती है कि उसके साथ मिलकर पॉप और शास्त्रीय संगीत का फ्यूजन तैयार करना चाहती है। दरअसल, उसकी एक म्यूजिक कंपनी से डील हुई है, लेकिन वह पूरा नहीं कर पा रही है। उसे लगता है कि राधे के साथ मिल कर वह म्यूजिक कंपनी के लिए हिट नंबर तैयार कर सकती है। लेकिन राधे को हमेशा पंडित जी का डर सताता है। उसे अपने परिवार और अपने प्यार के बीच फंसा है। राधे और तमन्ना अपनी अपनी मुश्किलों में फंसे एक-दूसरे के करीब आते जाते हैं। और इसी सबके बीच में पहली पत्नी से पैदा हुए पंडित जी के बेटे पंडित दिग्विजय (अतुल कुलकर्णी) आ जाते हैं और राठौर घराने के वास्तविक उत्तराधिकारी होने का दावा ठोक देते हैं। राठौर परिवार के कई राज धीरे-धीरे राधे के सामने खुलते हैं। जोधपुर राजघराने के राजा की मौजूदगी में राठौर घराने का उत्तराधिकारी चुनने के लिए ‘संगीत सम्राट’ मुकाबले का आयोजन होता है, जिसमें पंडित जी के प्रतिनिधि के रूप में राधे अपने ताऊ पंडित दिग्विजय का मुकाबला करता है।
इस सिरीज को भारतीय और पॉप संगीत की जुगलबंदी वाली सिरीज के रूप में प्रचारित किया गया था, लिहाजा इसमें हर तरह का संगीत है, लेकिन प्रधानता शास्त्रीय संगीत की ही है। यह सीजन मुख्य रूप से शास्त्रीय संगीत को ही ध्यान में रख कर बनाया गया है। हो सकता है, अगले सीजन में मॉडर्न संगीत को बराबर या अधिक जगह मिले। शंकर-एहसान-लॉय ने सिरीज के मूड के हिसाब से बेहतरीन संगीत दिया।

‘जागो मोहन प्यारे’ बंदिश से शुरू हुई यह सिरीज पहले दृश्य में ही मन मोह लेती है। इसमें संगीत जितना बढ़िया है, गायकी भी उतनी ही कर्णप्रिय है। ‘बंदिश बैंडिट्स’ का अंतिम एपिसोड तो शास्त्रीय संगीत का विभोर कर देने वाले कार्यक्रम लगता है। इसका हर कंपोजिशन अभिभूत कर देता है। गायकों की गायकी अभिभूत कर देने वाली है। सिर्फ संगीत ही नहीं, इसकी कहानी, पटकथा और प्रस्तुती भी भाने वाली है। आनंद कुमार का निर्देशन अच्छा है। उन्होंने सिरीज को बहुत रोचक तरीके से पेश किया है, जिससे दर्शक शुरू से आखिर तक बंधे रहते हैं।

नसीरुद्दीन शाह का अभिनय सिरीज को ऊंचाई पर ले जाता है। वह एक संगीत साधक और गुरु की भूमिका में इतने स्वाभाविक दिखते हैं कि लगता ही नहीं, अभिनय कर रहे हैं। इसके अलावा, उनके किरदार का एक कुटिलता भरा पहलू भी है, जो फ्लैशबैक में दिखता है। उसमें भी उन्होंने कमाल का अभिनय किया है। ऋत्विक और श्रेया की जोड़ी बहुत भली लगती है और दोनों अपने किरदार में एकदम फिट लगते हैं। ऋत्विक गाते हुए बहुत नेचुरल लगते हैं, जब आलाप लेते हैं, तब वह एकदम वास्तविक गायक की तरह लगते हैं। श्रेया भी बहुत प्रभावित करती हैं। उनका चुलबुलापन प्यारा लगता है। भावुक दृश्यों में भी वह असर छोड़ती हैं। अतुल कुलकर्णी सिद्धहस्त गायक की तरह लगते हैं। उनको देख कर मजा आ जाता है। शीबा चड्ढा अपनी आंखों से अपने दुख को बयां कर देती है। बेहतरीन काम किया है उन्होंने। पंडित जी के बड़े बेटे और राधे की पिता राजेंद्र की भूमिका में राजेश तैलंग का काम भी बहुत अच्छा है। देवेंद्र के रूप में अमित मिस्त्री ने अच्छा काम किया है। सारे ही कलाकार प्रभावित करते हैं। 
यह सिरीज संगीतप्रेमियों के लिए सुंदर उपहार है। इसे देख (सुन) कर मन तृप्त हो जाता है। यह सिरीज वास्तव में बंदिश की बैंडिट है, जो दिल लूट लेती है।

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