जनकपुरधाम में होगा अंतिम विश्राम

मिथिला मध्यपरिक्रमा: महोत्तरी से धनुषा की ओर बढ़े श्रद्धालु

मिथिला मध्यपरिक्रमा के यात्री महोत्तरी जिले की यात्रा पूरी कर धनुषा के लिए रवाना हुए। 133 किलोमीटर की 15 दिवसीय परिक्रमा आस्था, परंपरा और भारत-नेपाल सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है।

By : Local News of India
मिथिला मध्यपरिक्रमा: महोत्तरी से धनुषा की ओर बढ़े श्रद्धालु

डोला संग नंगे पांव आगे बढ़ते मिथिला मध्यपरिक्रमा के श्रद्धालु।

आकांशा खटाना 
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया 

मिथिला मध्यपरिक्रमा के यात्रियों ने महोत्तरी जिले की यात्रा पूरी कर ली है। जिले के कञ्चनवन में आठवें दिन सोमवार को रात्रि विश्राम करने के बाद यात्री आज मंगलवार को नौवें दिन धनुषा की ओर प्रस्थान कर गए। कञ्चनवन इस यात्रा में होली महोत्सव के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

कञ्चनवन इस परिक्रमा का आठवां रात्रि विश्राम स्थल है तथा महोत्तरी जिले का पांचवां पड़ाव। इससे पहले चौथे दिन महोत्तरी में प्रवेश करने वाले यात्रियों ने मटिहानी, जलेश्वर, मडै और ध्रुवकुण्ड में रात्रि विश्राम किया । जनकपुरधाम को केंद्र मानकर कुल 133 किलोमीटर के वृत्त में आयोजित होने वाली 15 दिवसीय इस परिक्रमा में धनुषा जिले में छह तथा भारत के मधुबनी जिले में चार रात्रि विश्राम की परंपरा है।

फागुन अमावस्या के दिन धनुषा जिले की मिथिलाविहारी नगरपालिका के ठेराकचुरी स्थित मिथिलाविहारी मंदिर से प्रारंभ हुई यह यात्रा मिथिलाविहारी (श्रीराम) और किशोरीजी (सीताजी) की प्रतिमाओं को डोला (डोली) में साथ लेकर नंगे पांव की जाती है। आज कञ्चनवन से धनुषा के लिए रवाना हुए यात्री पर्वता में रात्रि विश्राम करेंगे। इसके बाद 10वें दिन धनुषाधाम, 11वें दिन सतोखरधाम, 12वें दिन औरही तथा अंतिम 15वें दिन का रात्रि विश्राम जनकपुरधाम के रंगशाला मैदान में होगा। इससे पहले प्रथम दिन यात्रियों ने धनुषा के हनुमानगढ़ी में रात्रि विश्राम किया था।

इस यात्रा के दौरान भारत के मधुबनी जिले में कल्याणेश्वर (कलना), गिरिजास्थान (फुलहर), करुणा और बिसौल क्रमशः दूसरे, तीसरे, 13वें और 14वें दिन के रात्रि विश्राम स्थल होते हैं। इस परिक्रमा में नेपाल की ओर महोत्तरी और धनुषा में 107 किलोमीटर तथा भारत की ओर 26 किलोमीटर की दूरी तय की जाती है।

मटिहानी स्थित लक्ष्मीनारायण मठ के उत्तराधिकारी महंत डॉ. रविन्द्रदास वैष्णव के अनुसार, त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और देवी सीता विवाह के बाद तत्कालीन मिथिला राज्य के विभिन्न स्थानों पर वनविहार करते हुए भ्रमण पर निकले थे। उन्हीं के पदचिह्नों का अनुसरण करने की आस्था से इस परिक्रमा की परंपरा स्थापित की गई। उनके अनुसार यह यात्रा मानव कल्याण और मोक्ष की कामना के साथ की जाती है।

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