अंजली गुप्ता
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया l
कोलकाता, 31 मार्च l कोलकाता से सामने आई जानकारी के अनुसार पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार पहाड़ी क्षेत्रों की राजनीति बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कर्सियांग की तीन सीटों पर पारंपरिक मुकाबले से अलग इस बार पंचकोणीय (पांच पक्षों वाला) चुनावी संघर्ष देखने को मिलेगा।
राज्य की अधिकांश सीटों पर जहां तृणमूल कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा-आईएसएफ गठबंधन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच मुकाबला है, वहीं इन पहाड़ी सीटों पर समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं।
इन तीनों सीटों पर भाजपा (गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन के साथ), भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा, इंडियन गोरखा जनशक्ति फ्रंट, वाम मोर्चा-आईएसएफ गठबंधन और कांग्रेस आमने-सामने हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इंडियन गोरखा जनशक्ति फ्रंट के अलग से चुनाव लड़ने से इन सीटों पर वोटों का समीकरण काफी जटिल हो गया है। खासकर गोरखा समुदाय के मतदाता, जो यहां निर्णायक भूमिका निभाते हैं, इस बार परिणाम तय करने में अहम होंगे।
भाजपा और उसके सहयोगी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का मानना है कि IGJF के मैदान में उतरने से विरोधी वोटों का बंटवारा होगा, जिससे उन्हें फायदा मिलेगा।
वहीं भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि IGJF की मौजूदगी से भाजपा-गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगेगी और इससे उनके उम्मीदवारों की स्थिति मजबूत होगी।
IGJF प्रमुख अजय एडवर्ड्स ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी पार्टी किसी का वोट काटने नहीं बल्कि तीनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए मैदान में है। उन्होंने कहा कि गोरखा समुदाय लंबे समय से अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर निराश है और यही उनका मुख्य चुनावी मुद्दा है।
दूसरी ओर, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के महासचिव रोशन गिरी ने भाजपा के समर्थन का बचाव करते हुए कहा कि उनकी पार्टी स्थायी राजनीतिक समाधान और गोरखालैंड के मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
वहीं अनित थापा ने कहा कि उनकी पार्टी का फोकस पहाड़ी क्षेत्रों के विकास पर है और इसके लिए राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के साथ तालमेल जरूरी है।
कुल मिलाकर, दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कर्सियांग की सीटें इस बार सिर्फ चुनावी मुकाबला नहीं, बल्कि गोरखा राजनीति और क्षेत्रीय समीकरणों की दिशा तय करने वाली अहम जंग बन गई हैं।