लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
ऋचा बर्नवाल
कारगिल युद्ध के महानायक और परमवीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विक्रम बत्रा की शहादत दिवस पर पूरा देश उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। 7 जुलाई 1999 को ऑपरेशन विजय के दौरान जम्मू-कश्मीर के द्रास सेक्टर में दुश्मनों से लोहा लेते हुए उन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनका साहस, नेतृत्व और देशभक्ति आज भी भारतीय सेना और देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में 9 सितंबर 1974 को जन्मे कैप्टन विक्रम बत्रा भारतीय सेना की 13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स (13 JAK Rifles) के अधिकारी थे। कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें 'शेरशाह' कोडनेम दिया गया था। जून 1999 में उन्होंने अपने साथियों के साथ दुश्मन के कब्जे से प्वाइंट 5140 पर विजय हासिल की। इस ऐतिहासिक सफलता के बाद उन्होंने रेडियो पर विजय संदेश दिया—"ये दिल मांगे मोर"। यह वाक्य देशभर में उनकी वीरता का प्रतीक बन गया और आज भी भारतीय युवाओं में जोश भर देता है।
प्वाइंट 5140 पर विजय के बाद कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण प्वाइंट 4875 पर कब्जा करने का मिशन सौंपा गया। दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच उन्होंने अग्रिम मोर्चे से नेतृत्व किया। लड़ाई के दौरान जब उनका एक साथी सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गया, तो कैप्टन बत्रा बिना अपनी जान की परवाह किए उसे बचाने के लिए आगे बढ़े। इसी दौरान दुश्मन की गोली और रॉकेट हमले में वह गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी अगुवाई में भारतीय सेना ने अंततः प्वाइंट 4875 पर कब्जा कर लिया, जिसे बाद में उनके सम्मान में 'बत्रा टॉप' नाम दिया गया।
कैप्टन विक्रम बत्रा के अदम्य साहस, असाधारण नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनका प्रसिद्ध कथन—"या तो तिरंगा फहराकर लौटूंगा, या तिरंगे में लिपटकर लौटूंगा, लेकिन लौटूंगा जरूर"—आज भी देशभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा का अमर संदेश माना जाता है।
आज, उनकी शहादत के वर्षों बाद भी कैप्टन विक्रम बत्रा का नाम भारतीय सेना के सबसे साहसी योद्धाओं में सम्मान के साथ लिया जाता है। हर वर्ष 7 जुलाई को देश उनके बलिदान को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि देता है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश है कि राष्ट्र की रक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं और मातृभूमि के लिए दिया गया बलिदान सदैव अमर रहता है।