लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
अक्सर मोहल्लों और कॉलोनियों में बर्तन बेचने वाले लोग पुराने कपड़ों के बदले स्टील या प्लास्टिक के बर्तन दे जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये पुराने कपड़े आखिर जाते कहां हैं और इनका आगे क्या होता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, घरों से इकट्ठा किए गए कपड़ों को सबसे पहले बड़े गोदामों में ले जाकर उनकी छंटाई की जाती है। अच्छी स्थिति में मौजूद कपड़ों को साफ कर सेकेंड-हैंड बाजारों में दोबारा बेचा जाता है या जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जाता है।
जो कपड़े पहनने योग्य नहीं होते, उन्हें रीसाइक्लिंग प्रक्रिया में भेजा जाता है। इनसे पोछा, औद्योगिक सफाई के कपड़े, गद्दों की भराई, कुशन, इंसुलेशन सामग्री और कई अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। कुछ वस्त्रों को फाइबर में बदलकर नए टेक्सटाइल उत्पाद बनाने का भी प्रयास किया जाता है, हालांकि यह प्रक्रिया सभी कपड़ों पर लागू नहीं हो पाती।
पुराने कपड़ों के बदले बर्तन देने वाले व्यापारी इन कपड़ों को थोक कारोबारियों को बेचते हैं। कपड़ों की गुणवत्ता, वजन और उपयोगिता के आधार पर उनकी कीमत तय होती है। यही वजह है कि यह व्यवस्था वर्षों से एक अनौपचारिक लेकिन बड़े कारोबार का हिस्सा बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने कपड़ों का दोबारा उपयोग और रीसाइक्लिंग न केवल कचरे को कम करता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सर्कुलर इकोनॉमी को भी बढ़ावा देता है। इससे वस्त्रों का जीवनकाल बढ़ता है और नए कपड़ों के उत्पादन में लगने वाले संसाधनों की बचत होती है।