लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
शालू कुमारी
ऐन फ्रैंक (Anne Frank) का नाम दुनिया के इतिहास में साहस, उम्मीद और मानवता के प्रतीक के रूप में दर्ज है। महज 15 वर्ष की उम्र में उनकी जिंदगी खत्म हो गई, लेकिन उनकी लिखी डायरी ने उन्हें हमेशा के लिए अमर बना दिया।
ऐन फ्रैंक का जन्म 12 जून 1929 को जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में एक यहूदी परिवार में हुआ था। नाजी शासन के दौरान यहूदियों पर बढ़ते अत्याचारों के कारण उनका परिवार नीदरलैंड के एम्स्टर्डम चला गया। लेकिन जब नाजी सेना ने वहां भी कब्जा कर लिया, तो परिवार को छिपकर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
साल 1942 से 1944 के बीच ऐन फ्रैंक अपने परिवार और कुछ अन्य लोगों के साथ एम्स्टर्डम के एक गुप्त ठिकाने में छिपकर रहीं। इसी दौरान उन्होंने अपनी डायरी लिखी, जिसमें उन्होंने डर, उम्मीद, सपनों और युद्ध के बीच बीत रहे अपने जीवन को बेहद संवेदनशील तरीके से दर्ज किया।
अगस्त 1944 में गुप्त ठिकाने का पता चलने के बाद ऐन फ्रैंक और उनके परिवार को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें अलग-अलग नाजी यातना शिविरों में भेजा गया। माना जाता है कि 1945 की शुरुआत में जर्मनी के बर्गेन-बेलसेन शिविर में टाइफस बीमारी के कारण उनकी और उनकी बहन मार्गोट की मृत्यु हो गई।
युद्ध समाप्त होने के बाद ऐन फ्रैंक के पिता ओटो फ्रैंक परिवार के एकमात्र जीवित सदस्य बचे। उन्होंने ऐन की डायरी को प्रकाशित कराया। "द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल" आज दुनिया की सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों में गिनी जाती है और 70 से अधिक भाषाओं में अनुवादित हो चुकी है।
ऐन फ्रैंक की कहानी केवल एक बच्ची की निजी डायरी नहीं, बल्कि होलोकॉस्ट के दौरान लाखों निर्दोष लोगों पर हुए अत्याचारों की मार्मिक गवाही है। उनकी लिखी बातें आज भी दुनिया को शांति, सहिष्णुता और मानवाधिकारों का महत्व याद दिलाती हैं।