गुरप्रीत कालरा
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने बड़े पैमाने पर रियायती रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई थी। इससे भारत को आयात बिल कम रखने और घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव घटाने में मदद मिली। लेकिन अब अमेरिका लगातार रूस के ऊर्जा राजस्व को सीमित करने के लिए प्रतिबंधों और व्यापारिक दबाव का इस्तेमाल कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूसी तेल पर मिलने वाली छूट कम होती है या खरीद में बाधाएं बढ़ती हैं, तो भारत को मध्य पूर्व, अमेरिका या अन्य स्रोतों से अपेक्षाकृत महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है। इससे तेल आयात बिल बढ़ सकता है और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव आ सकता है। हालांकि भारत ने लगातार अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविध बनाने की नीति अपनाई है ताकि किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम रहे।
हाल के महीनों में अमेरिका और भारत के बीच व्यापार एवं ऊर्जा को लेकर कई समझौते और बातचीत हुई हैं। अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिया है कि रूसी तेल खरीद को लेकर उसकी निगरानी जारी रहेगी, जबकि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बता रहा है।
भारत पर संभावित असर
- कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ सकता है।
- पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव आ सकता है।
- महंगाई पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।
- भारत को वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से अधिक तेल खरीदना पड़ सकता है।
- ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति के बीच संतुलन की चुनौती बढ़ सकती है।