गुरप्रीत कालरा
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
लखनऊ: जनता जब अपनी समस्या लेकर किसी जनप्रतिनिधि के दरवाजे तक पहुंचती है तो उसकी सबसे बड़ी उम्मीद होती है कि उसकी बात सुनी जाएगी और संबंधित विभाग तक पहुंचाकर समाधान की कोशिश की जाएगी। लेकिन इसी प्रक्रिया के बीच एक बड़ा सवाल अब पारदर्शिता को लेकर खड़ा किया जा सकता है—क्या समस्या के समाधान के नाम पर कहीं आर्थिक सहयोग या ‘सुविधा शुल्क’ जैसी व्यवस्था को जगह मिल रही है?
यह सवाल किसी एक नेता या जनप्रतिनिधि पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर है जिसमें जनता अपनी शिकायत लेकर पहुंचती है।
समस्या के समाधान के बदले आर्थिक अपेक्षा?
अगर कोई नागरिक किसी जनप्रतिनिधि, उनके कार्यालय या किसी अधिकृत प्रतिनिधि के पास शिकायत लेकर जाता है, तो उसे यह स्पष्ट होना चाहिए कि शिकायत दर्ज कराने या उसे संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए किसी निजी भुगतान की आवश्यकता है या नहीं।
यदि किसी स्तर पर आर्थिक सहयोग मांगा जाता है, तो उसके उद्देश्य, प्राप्तकर्ता और उपयोग का रिकॉर्ड क्या है? क्या उसकी कोई रसीद या आधिकारिक प्रक्रिया है?
यही वे सवाल हैं जिनका जवाब पारदर्शी तरीके से सामने आना जरूरी है। केवल चर्चाओं या आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन यदि ऐसी शिकायतें सामने आती हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच की व्यवस्था जरूर होनी चाहिए।
‘प्रतिनिधि’ और ‘मध्यस्थ’ के बीच की रेखा
जनप्रतिनिधियों के साथ बड़ी संख्या में कार्यकर्ता, सहयोगी और स्थानीय प्रतिनिधि जुड़े होते हैं। आम नागरिक के लिए हमेशा यह स्पष्ट नहीं होता कि कौन व्यक्ति किस आधिकारिक भूमिका में किसी शिकायत पर बात कर रहा है।
यहीं से जवाबदेही का सवाल पैदा होता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी शिकायतकर्ता से यह कहकर आर्थिक मदद मांगता है कि उसके जरिए समस्या को अधिकारियों तक पहुंचाया जाएगा या उसका समाधान कराया जाएगा, तो शिकायतकर्ता के पास इसकी जानकारी देने और जांच कराने का स्पष्ट रास्ता होना चाहिए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में जनप्रतिनिधि का अधिकृत प्रतिनिधि है या नहीं।
जनसुनवाई की असली कसौटी क्या?
उत्तर प्रदेश सरकार का जनसुनवाई-समाधान पोर्टल नागरिकों को ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने, उसकी स्थिति देखने, निर्धारित समय में कार्रवाई नहीं होने पर रिमाइंडर भेजने और निस्तारण के बाद फीडबैक देने की सुविधा देता है। आधिकारिक पोर्टल के अनुसार, निस्तारण की गुणवत्ता पर मिले फीडबैक का उच्च अधिकारियों द्वारा मूल्यांकन किया जा सकता है और निस्तारित शिकायत को दोबारा सक्रिय भी किया जा सकता है।
यानी शिकायत समाधान के लिए एक औपचारिक डिजिटल व्यवस्था पहले से मौजूद है। इसके अलावा सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों के लिए अलग एंटी-करप्शन पोर्टल भी उपलब्ध है, जहां नागरिक शिकायत दर्ज कर सकते हैं और उसकी कार्रवाई की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
सवाल किसी व्यक्ति से नहीं, व्यवस्था से
ऐसे में कुछ बुनियादी सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं—
क्या जनसुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता से किसी तरह के निजी आर्थिक भुगतान की अपेक्षा होनी चाहिए?
अगर किसी प्रतिनिधि या सहयोगी के स्तर पर आर्थिक सहयोग लिया जाता है, तो उसका रिकॉर्ड और उद्देश्य सार्वजनिक होना चाहिए या नहीं?
क्या आम नागरिक को बिना किसी आर्थिक दबाव के अपनी शिकायत जनप्रतिनिधि तक पहुंचाने का अधिकार नहीं होना चाहिए?
और सबसे अहम सवाल—
अगर किसी शिकायतकर्ता से समस्या समाधान के नाम पर पैसे मांगे जाने की शिकायत सामने आती है, तो उसकी स्वतंत्र जांच की व्यवस्था कितनी आसानी से उपलब्ध है?
शिकायत हो तो आधिकारिक रास्ता भी मौजूद
उत्तर प्रदेश सरकार के जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायतकर्ता अपनी शिकायत दर्ज कर उसे ट्रैक कर सकता है और समयसीमा में कार्रवाई न होने पर रिमाइंडर भेज सकता है।
वहीं भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों के लिए एंटी-करप्शन पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध है। सरकार के पोर्टल के मुताबिक, किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी शिकायत दर्ज की जा सकती है और जांच के बाद दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई का प्रावधान है।
इसलिए किसी भी आर्थिक लेन-देन या भ्रष्टाचार संबंधी आरोप को केवल चर्चा या सोशल मीडिया के आधार पर सही मानने के बजाय उपलब्ध दस्तावेज, शिकायत और जांच के आधार पर ही परखा जाना चाहिए।
जनता चाहती है स्पष्ट व्यवस्था
जनप्रतिनिधित्व का मूल आधार जनता का विश्वास है। इसलिए जनसुनवाई की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी होगी, उतना ही जनता का भरोसा मजबूत होगा।
जरूरत इस बात की है कि शिकायतकर्ता को साफ जानकारी मिले कि कौन व्यक्ति किस हैसियत से उसकी शिकायत पर काम कर रहा है, शिकायत का आधिकारिक रास्ता क्या है और किसी तरह की अनुचित आर्थिक मांग सामने आने पर शिकायत कहां की जा सकती है।
जनसुनवाई अगर जनता की आवाज है, तो उसमें पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे जरूरी होनी चाहिए।
यह लेख किसी व्यक्ति विशेष पर धनउगाही या भ्रष्टाचार का आरोप स्थापित नहीं करता। इसका उद्देश्य जनसुनवाई की प्रक्रिया में पारदर्शिता, शिकायतकर्ता की सुरक्षा और जवाबदेही से जुड़े सवालों को सामने रखना है।
लेखक: व्योमेंद्र कुमार सिंह, चुनावी प्रबंधन संस्था इलेक्टलाइन में राजनीतिक विश्लेषक और लोकल न्यूज ऑफ इंडिया में ब्यूरो हेड।