लिसिका ग्रोवर
लोकल न्यूज़ ऑफ़ इंडिया
नेपाल में आम चुनाव के बाद गठित नई सरकार के पहले संसदीय अधिवेशन में एक असामान्य स्थिति देखने को मिली, जब प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने पूरे सत्र के दौरान कोई संबोधन नहीं दिया। शनिवार को संसद का पहला अधिवेशन बिना प्रधानमंत्री के भाषण के ही समाप्त हो गया।
बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में जेनजी आंदोलन के प्रभाव से हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव के बाद करीब दो-तिहाई बहुमत की सरकार बनी थी। ऐसे में यह उम्मीद की जा रही थी कि प्रधानमंत्री संसद में अपने विचार रखते हुए सरकार की प्राथमिकताओं, नीतियों और योजनाओं की जानकारी देंगे।
सामान्य तौर पर चुनाव के बाद प्रधानमंत्री संसद को संबोधित करते हुए सरकार के विज़न और नीतिगत दिशा को स्पष्ट करते हैं। हालांकि यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन यह एक स्थापित परंपरा रही है।
प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने 27 मार्च को शपथ लेने के बाद 100 दिनों की कार्ययोजना भी जारी की थी, जिसमें प्रशासनिक सुधार, नए कानून बनाने और पुराने कानूनों में संशोधन जैसे कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं। इन योजनाओं को लागू करने के लिए संसद का सहयोग आवश्यक माना जाता है।
इसके बावजूद, प्रधानमंत्री ने इस कार्ययोजना को संसद में पेश नहीं किया और न ही इसे औपचारिक रूप से सदन के संज्ञान में लाया। परिणामस्वरूप, सांसदों को भी सरकार की प्राथमिकताओं की जानकारी मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से ही मिल पाई।
संसदीय मामलों के जानकार इस स्थिति को असामान्य मान रहे हैं। संघीय संसद सचिवालय के पूर्व महासचिव मनोहर प्रसाद भट्टराई ने कहा कि आम चुनाव के बाद संसद के पहले अधिवेशन में प्रधानमंत्री द्वारा संबोधन करना एक स्थापित परंपरा रही है। इस परंपरा के विपरीत पूरे सत्र में प्रधानमंत्री के मौन रहने पर उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया।