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चुनाव आयोग की ' कार सेवा ' पर खामोश हैं अख़बार !

Administrator 19-04-2019 17:03:19



संजय कुमार सिंह  

चुनाव के दौरान आयकर छापों से यह संदेश जाता है कि जो दल सत्ता में है वह पहले की सरकारों के मुकाबले 'अच्छी' या 'निष्पक्ष' कार्रवाई कर रहा है भले ही सत्तारूढ़ दल पर छापे नहीं पड़ें या उसकी खबर अपेक्षाकृत रूप से कम छपे। 2019 चुनाव के दौरान पड़े छापों और उसपर प्रभावित दलों की प्रतिक्रिया के साथ-साथ राजस्व सचिव को चुनाव आयोग का पत्र, उनका जवाब और चुनाव आयोग की कार्रवाई से नहीं लगता है कि मामला साफ-सुथरा है. 

ऐसे में डीएमके नेता कनिमोझी के घर पर आयकर छापा उल्लेखनीय है. लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान से पहले दक्षिण भारत में आयकर विभाग की यह बड़ी कार्रवाई इलाके में चुनाव प्रचार की अवधि खत्म होने के बाद शुरू हुई और कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला। ज्यादातर अखबारों में यह नहीं बताया गया और ना ही यह कि बरामद क्या हुआ या कितनी राशि जब्त हुई. कुल मिलाकर यह आयकर छापे से छवि बनाने और बिगाड़ने का खेल था. हालांकि, अब यह उल्टा पड़ा गया लगता है. 

आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि प्रधानमंत्री के हेलीकॉप्टर से कर्नाटक के चित्रदुर्ग में एक काला बक्सा उतरा जिसे लेकर कुछ लोग एक अलग गाड़ी से चले गए जो पीएम के काफिले का हिस्सा नहीं था. शक है कि इसमें नकद रहा होगा. इस मामले में कोई स्पष्टीकरण नहीं है. इसके बाद प्रधानमंत्री के हेलीकॉप्टर की जांच करने के आरोप में एक आईएएस अफसर को सफाई देने का मौका दिए बगैर मुअत्तल कर दिया गया. प्रेस कांफ्रेंस में पूछताछ होने पर बताया गया कि एक अधिकारी को मामले की जांच के लिए भेजा गया है. 

मामला प्रधानमंत्री के खिलाफ था तो जांच से पहले कार्रवाई और प्रधानमंत्री द्वारा भाषण में सेना के नाम पर वोट मांगने के मामले में कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है. राज्यपाल कल्याण सिंह के मामले में चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रपति से शिकायत किए जाने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई है. दूसरी ओर, गुरुवार की शाम खबर आई कि विमान से उतरे केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के सामान की जांच करने की मांग की गई तो वे भड़क गए और इसपर काफी देर तक बहस होती रही पर उन्होंने सामान की जांच नहीं करने दी. इस मामले में चुनाव आयोग कि किसी कार्रवाई की खबर नहीं है. 

दूसरी ओर, लग रहा है कि मौजूदा परिस्थितियों से नाराज अधिकारियों ने अपने स्तर पर कार्रवाई की है.  इस तरह, सरकार ने अगर आयकर छापों से जो लाभ लिया गया तो वह प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के हेलीकॉप्टर की जांच पर जोर दिए जाने तथा उनकी चर्चा से धुल गया. यह सब अखबारों में सही खबरें नहीं छपने और छापे जैसी कार्रवाई तथा उसकी आधी-अधूरी खबर से विपक्ष की छवि खराब करने का खेल है. इसमें पीड़ित को कुछ करने का मौका भी नहीं मिलता है. 

संभावना है कि तमिलनाडु में द्रमुक नेताओं के यहां आयकर छापों से भाजपा यह साबित करने की कोशिश कर रही हो कि 2014 से पहले उसने जिन दलों पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाया था वह निराधार नहीं था. भ्रष्ट व सुस्त मीडिया इसमें उसका साथ दे रहा है. अगर अखबारों में खबरें ठीक से छप रही होतीं तो छापों से लाभ लेने की कोशिश ही नहीं होती. गनीमत यही है कि सोशल मीडिया से सच पता चल जा रहा है वरना इस दल की योजना और उसे लागू करने का अंदाज तो बहुत ही खतरनाक है.  

आपको याद होगा कि नरेन्द्र मोदी ने 2014 के चुनाव से पहले 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को भ्रष्टाचार का बड़ा मामला बनाया था. उस समय के केंद्रीय मंत्री और द्रमुक नेता ए. राजा, राज्‍यसभा सांसद कनिमोई समेत 14 लोगों को आरोपी बनाया गया था. अदालत में यह मामला टिक नहीं पाया. फैसले में जज ने लिखा था, “... पिछले लगभग सात साल से पूरी तन्मयता के साथ सभी कार्यदिवसों पर, जिनमें ग्रीष्मावकाश भी शामिल हैं, ओपन कोर्ट में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बैठा रहा और इंतज़ार करता रहा कि कोई शख्स कानूनन स्वीकार्य सबूत लेकर सामने आएगा, लेकिन सब व्यर्थ गया. .... बहरहाल, सार्वजनिक धारणा का न्यायिक कार्यवाही में कोई स्थान नहीं होता।”

अब जब कनिमोई लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं तो मतदान से पहले उनके घर पर आयकर छापा मारकर उनकी छवि खराब करने की कोशिश की गई. बाद में कह दिया गया कि छापे जैसी कार्रवाई गलत सूचना पर की गई थी. आज के समय में जब सूचनाएं (और अफवाह) तेजी से फैलती हैं तो चुनाव के समय इन छापों पर रोक लगना जरूरी है. छापों में बरामद धन की राशि से यह राय बनती है कि अमुक दल ज्यादा भ्रष्ट है जबकि चुनाव के बाद पता चलता है कि धन सही तरीकों से चुनाव के लिए इकट्ठा किया गया था. यह राशि चुनाव के लिए ही होती है. जब्ती से तो नुकसान होता ही है खबर छपने से भी नुकसान होता है और बाद में राशि ठीक पाई जाती है, लौटा दी जाती है.  शुक्रवार 

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