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इस फिल्म के बाद फैली देश में केंडल मार्च की प्रथा

Deepak Chauhan 10-05-2019 20:51:06



देश में लोकतंत्र होने से सबको अपने विचार प्रकट करने की पूरी छूट मिली हुयी है। साथ ही व्यक्ति किसी भी प्रकार के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ भी अपना विरोध प्रकट कर सकता है। विरोध प्रकट करने के है व्यक्ति के अपने कुछ तरीके हो सकते है, कई लोग नारे लगा कर अपना गुस्सा दिखते है तो कई लोग शांति से बैठकर उसे शांतिपूर्ण धरने का नाम देते है। इसी में तो कई लो दिन ढलते ही मोमबत्ती जलाकर अपने विरोध को केंडल मार्च के रूप में सजाते है।  

2006 में आई फिल्म ‘रंग दे बसंती’ ने युवाओं को एक नये तरीके से पेश किया था. फिल्म में साफ संदेश दिया गया था कि डैंड्रफ और घूमा-फिरी जैसी बातों में घिरा युवा देश और राजनीति से भाग नहीं सकता. इस फिल्म में हुए कैंडल मार्च के बाद भारत में कई जगह कुछ गलत होने पर कैंडल मार्च की प्रथा चल पड़ी. पहले भी कैंडल मार्च होते थे, लेकिन इस फिल्म ने विरोध के इस शांतिपूर्ण तरीके को नया आयाम दिया. इस फिल्म का सबसे जटिल किरदार था- डिफेंस डील कराने वाले बड़े व्यापारी राजनाथ सिंघानिया (अनुपम खेर) के बेटे करण (सिद्धार्थ) का.

करण को जब पता चलता है कि मिग-21 जैसे कम क्षमता वाले विमान को खरीदवाने में उसके पिता की भूमिका थी तो वो अपने पिता को ही मार देता है. इस विमान की वजह से करण का पायलट दोस्त मर गया होता है और सरकार उसे ही दोषी ठहरा रही होती है. जबकि डिफेंस मंत्रालय में विमानों की खरीद को लेकर घोटाला हुआ रहता है. इसके मद्देनजर सिद्धार्थ का कैरेक्टर भावनात्मक रूप से सबसे ज्यादा जटिल था। इस फिल्म में युवाओं को भगत सिंह, राजगुरू, अशफाकउल्ला, बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद से जोड़कर देखा गया था. फिल्म की शुरुआत में ही भगत सिंह बने सिद्धार्थ फांसी पर चढ़ने से पहले लेनिन की किताब पढ़ते नजर आते हैं. आजादी की लड़ाई और 2005 के दो कालखंडों में ये फिल्म चल रही होती है. 2005 के कालखंड में भी ये युवा अपने पायलट दोस्त की भ्रष्टाचार की वजह से हुई मौत पर फिर से आजादी के दीवानों का चोला धारण कर लेते हैं. उस वक्त ये फिल्म युवाओं में लोकप्रिय हुई थी. गौरतलब है कि डिफेंस मिनिस्ट्री में भ्रष्टाचार को दिखाती इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था और इसे ऑस्कर के लिए भी भेजा गया था। 

स फिल्म ने सीधा-सीधा सरकारी तंत्र पर सवाल उठाया था. अगर ये फिल्म आज रिलीज होती तो शायद नजारा कुछ और होता. बहरहाल, एक रोचक बात हुई है. इस फिल्म में भगत सिंह का किरदार निभाने वाले सिद्धार्थ ट्विटर पर खुलकर अपने विचार सत्ताधारी दल के खिलाफ रख रहे हैं. आज जब ज्यादातर कलाकारों पर सत्ता के करीब जाने के प्रयास करने के आरोप लगे रहे हैं, सिद्धार्थ लोगों को चकित कर रहे हैं. पिछले दिन नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी को लेकर एक अशोभनीय टिप्पणी की. सिद्धार्थ ने इस पर भी असहमति जताते हुए ट्वीट किया है. यही नहीं, वह अक्षय कुमार द्वारा मोदी के लिए गये ‘अराजनीतिक’ इंटरव्यू पर भी कड़ी प्रतिक्रिया जता चुके हैं.

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