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छत्तीसगढ़ का वो बाजार जहाँ होती मुर्गो की फाइट

Deepak Chauhan 09-05-2019 20:18:18



दुनिया में कई अलग-अलग प्रकार के खेलो को खेलना का चलन है।  जिसमे कई खेल तो इतने अजीब तरह के होते है जो लोगो को मोहित भी करते है  लोगो को गुस्सा भी दिलाते है। ऐसे ही कुछ खेल तो अपने भारत में भी खेले जाते है। इन खेलो की बात करे तो ये खेल पौराणिक काल से ही खेले जाते रहे है। दूसरी बात ये की इनको खेलने में उपयोग होने वाली सामग्री में कोई वास्तु न होकर के जीव का इस्तेमाल किया जाता है, और लोग अपने अनुसार चुने हुए जीव पर पैसा लगाते है। इसी तरह के एक खेल की आज हम बात करेंगे जो छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हर सप्ताह खेला जाता है। 


छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा का मशहूर खेल 

भारत का एक ऐसा इलाका जहा पर आज भी कई पुराने जाती से संबंध रखने वाले लोग रखते है। साथ ही वे लोग कई ऐसी पुअरनि सभ्यताओं, मान्यताओं और खेलो को आज भी मानते अथवा खेलते है। इसी शहर के दंतेवाड़ा में लगने वाले साप्ताहिक बाजार में ऐसा ही खेल खेला जाता है।  दंतेवाड़ा के गीदम के साप्ताहिक बाजार में सैकड़ों लोग आते है, जिसमे ज्यादातर पुरुष ही होते हैं। दरसल इनका यहाँ इकठ्ठा होने का मकसद मुर्गे की कुश्ती का होना होता है। जिसमे ये लोग अपने पसंदीदी और ताकतवर मुर्गे पर पैसों का दांव खेलते है। बस्तर में साप्ताहिक हाट या बाजार, कॉकटेल के पारंपरिक रक्त खेल के बिना अधूरा है। कई पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के रूप में खूनी और परेशान होने के कारण, कॉकफाइट्स को बस्तर की आदिवासी सांस्कृतिक पहचान का एक विशिष्ट पहलू माना जाता है।


मुर्गे की कृषि पर पाबन्दी 

कॉकफाइटिंग प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960 और एपी गेमिंग एक्ट, 1974 के तहत निषिद्ध है। पुलिस की फटकार के बावजूद, इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है। चूँकि इस कानून के तहत मुर्गे भी जीवों में ही आते है, और भारतीय संविधान के अनुसार भारत में रहने वेक सभी जीवों के लिए अपने अधिकार व उनके प्रति कुछ मौलिक अधिकार बनाये गए है। 


मुर्गा फाइट का मज़ा लेते लोग 

मुर्गो के बेड़े जो किसी कुश्ती का घेरा नुमा बना होता है उस घेरे के चारो तरफ चिलाते हुए खड़े लोग दो मुर्गो को बिड़ता देखा खूब कुश हो जाते। उनको ऐस लगता मानो दो बड़े शैतान अपने हाथो में नुक्ख दार ब्लेड लिए हुए एक दूसरे के शरीर को छल्ली कर देंगे। इसी बेच भेद में खड़े लोग जल्दी जल्दी अपना दांव लगते दिखाई पड़ते है। क्युकी इनकी फाइट सिर्फ 10 मिनट की होती है।  इस पुरे दिन मतलब दुपहर से शाम तक लगभग 40 से 50 मुकाबले हो जाते है। इन मुकलबलों के दौरान ही स्थानीय लोगों और दर्शकों ने महबूबा और सेल्फी (स्थानीय रूप से पीसा जाने वाली शराब) का इस्तेमाल किया।  यह खेल सिर्फ पक्षियों के लिए घातक नहीं है, 2014 में, एक व्यक्ति का मानना ​​था कि एक विशेष पुलिस अधिकारी माना जाता है कि माओवादियों ने मुर्गा लड़ाई में भाग लिया था। ये तस्वीरें 2016 में गिडम बाज़ार में ली गई थीं।  

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